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मेरे कृष्ण:

मेरे कृष्ण: मानव, महामानव या परब्रह्म
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(आ) कर्षयति इति कृष्ण:। आकर्षित करें वो कृष्ण।
कृष्ण के प्रति जैसा आकर्षण..वैसा कभी हुआ नहीं।
कृष्ण से बड़ा कोई रहस्य इस ब्रह्माण्ड में नहीं ।
कृष्ण ही माता हैं, वही पिता भी। मित्र-सखा भी वही, स्वामी-सर्वस्व भी...और नर के जीवनरथ सारथी भी बस नारायण कृष्ण ही तो हैं।
कृष्ण की अमृत कथा का कोई अंत नहीं है। स्मरण, श्रवण, कीर्तन, जप और सत्संगति से ही इस अमृत की कुछ बूँदों का पान किया जा सकता है। आप भी प्रयास कीजिए।
कृष्ण नामरस का आस्वादन तो किया जा सकता है, उसे बताना नितांत असम्भव है।

अबिगत गति कछु कहति न आवै,
ज्यों गूँगे मीठे फल को रस अन्तरगत ही भावै।

अनन्तकाल से वे क्षीरसागर के निवासी हैं। स्फटिक मणियों के मध्य गुमची, वैजयंती की माला और हाथ में शंख और सुदर्शन से सुशोभित शेषजी के हृदयारुढ अभी योगनिंद्रा में निमग्न हैं। गोलोक की राधा सिंधुकन्यका माँ लक्ष्मी उनके चरणों में हैं। कृष्ण के इस अद्भुत नारायण रूप को नमन।
भूमि ही जिनके पैर हैं...और नाभि अंतरिक्ष।
सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि जिनके त्रिनेत्र हैं, ऐसे सहस्रमुख और हाथ-…

महाभारत ४१ वीं कड़ी

आश्चर्यचकित देवराज इंद्र ने देखा कि परम् तेजस्विनी एक स्त्री उस मन्दाकिनी गंगाजी की पावन जल धारा में प्रवेश करके खड़ी है और विलाप कर रही है।
अनंत अश्रुओं से उसका मुख द्रवित है।
उसके अश्रुबिंदु टपकते हैं और गंगा में गिर जाते हैं।
जैसे ही उन अश्रु बिंदुओं का प्रक्षालन गंगाजी के जल में होता है...वह तत्काल ही स्वर्णकमल बन जाता है ।
इस चमत्कारिक और अद्भुत दृश्य को देखकर इंद्र अचंभित रह गए और उस सुंदरी युवती के समीप गए।
पूछा-
"हे सुकमालिनी ! आप कौन हैं तथा इस तरह से क्यों विलाप करतीं हैं ?
अपने दुःख का कारण मुझे बताइये।"
युवती ने उत्तर दिया-
" आपको प्रणाम हे देवराज !
मैंने आपको पहचान लिया है।
मैं अत्यन्त दुखी और भाग्यहीन स्त्री हूँ।
यदि आप मेरे दुःख को समझना चाहते हैं तो आइए मेरे साथ..।"
इतना कहकर वह भावहीन हो जल से निकल कर उत्तर दिशा की ओर चलने लगी। कौतूहलवश देवराज इंद्र भी उस स्त्री के पीछे- पीछे चलने लगे।
वह स्त्री बड़ी तीव्रता से चल रही थी और इंद्र को उसके पीछे जाने में दौड़ना पड़ रहा था।
थोड़े ही समय में वह पर्वतराज हिमालय के शिखर पर पहुँच गई।
उस शिखर पर आकर इंद्र ने…

मृत्यु सत्य जगत मिथ्या

मृत्यु सत्य जगत मिथ्या
(कुछ अलग और विचित्र कहानी है, पर पढ़ें और अपने विचार से अवगत अवश्य करावें.. आपकी समलोचना सर माथे)
करके देखें.. मैने तो किया। शवासन में लेटा था मैं...बस इतना ही याद है। ऐसा लगा कि ध्यान की स्थिति में चला गया। ...और फिर देखा कि मैं मर गया। हाँ.. हाँ सचमुच मर गया मैं।  पर...आश्चर्य! मैं यह देख कैसे पा रहा हूँ? हाँ... मैं देख रहा हूँ। मैंने चकित होते हुए देखा अपने आप को, अपने दोनो हाथों, पैरों की तरफ। लेकिन सामने तो पड़ा है मेरा शरीर... वो..उस बिस्तर पर।  अगर मैं जीवित हूँ तो फिर वह क्या है? मैं देख रहा हूँ, मेरा बेटा आसपास के लोगों को..पड़ोसियों को बुला लाया है।  शायद.. यह तो हमारे पड़ोसी डॉ. शर्मा हैं। मेरे समीप ही बैठ गए हैं बिस्तर पर। अपने स्टेथस्कोप से चेक कर रहे हैं, गिनती..धड़कनों की।  कुछ मिला नहीं है शायद, थोड़े से घबरा गए।  जल्दी से गर्दन पर नसों को ढूँढ रहे हैं। नसें तो खैर वहीं पर हैं पर स्पंदन कोई मिला नहीं। सिर हिलाया है उन्होंने और कुछ तो कहा है मेरे बेटे से..पत्नी की तरफ देख कर भी।  मैंने साफ सुना..कह रहे हैं "कुछ बचा नहीं अब! ही इज नो मोर..।" प…

जब बसंत आता

लौट आते हमारे बाबावृक्ष
हर साल
जब बसन्त आता,
जब जाते थे परलोक भी...
इहलोक से
तब भी वे लेते थे आनंद
अपनी यात्रा का...
जो बस जरा सी
पतझड़ की मृत्यु भर ही तो थी,
आत्मा तो उनकी अजर ही थी
क्या पता था उनको
ये जीवन बसन्त फिर आएगा?
नहीं सम्भवतया..
किसी को पता नहीं होता
तुम्हें पता है? या कि मुझे?
कोई नहीं जानता...जान पाया..
तो ये मौनीबाबा कैसे जानते..?
उनसे बिखरा...छिटका,
टूटा...या कि तोड़ा गया
फूल, पत्ता और फल
सब ही तो अंतिम था न...।
हमारा प्रेम..मोह खींच लाता
उनको बार बार
जब बसंत आता
उनके नाती पोते से पत्ते
फल औ फूल फिर लद जाते
उनके कांधों पर..चिपट जाते सीने पर
फिर फिर लौट आते बाबावृक्ष
जब बसंत आता..।

अभ्युदय (मेरा देश)

अभ्युदय (मेरा देश)
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"बता साले...नाम क्या है तेरा...बता..."
वह पाकिस्तानी सैनिक गला फाड़ कर चीख रहा था।
अभ्युदय...विंग कमांडर अभ्युदय निरंकार।
उसका चेहरा अब भी निर्विकार था। उसका पूरा मुख रक्त से लथपथ था और नाक से भल्ल भल्ल बहता रूधिर उसकी बड़ी, काली और ऐंठी हुई मूँछों में जाकर न जाने कहाँ विलीन हो रहा था।
यह शत्रु देश का मिलिट्री हेड क्वार्टर था। मिलिट्रीबेस कैंप में रखी एक फौलादी कुर्सी पर उसे कस कर बाँधा गया था जो सम्भवतया यातना देने के लिए ही बनाई गई थी।
उसके दोनों हाथ रस्सी और गर्दन को पतली वायर रोप से पीछे की तरफ खींच रखा गया था।
...पर वह तना हुआ बैठा था। साढ़े छह फुट की पुष्ट देहयष्टि पर जैसे उसे दी गई यातना का कोई असर न था।
भारतीय वायुसेना की पोशाक जैसे उसके गोरे शरीर को गर्व से भर दे रही थी।
...अच्छा!
मिशन क्या है तेरा...
-नहीं बता सकता।
किस स्क्वॉड्रन से है?
-बताने की अनुमति नहीं है।
स्साले...हरामजादे...यहाँ तू कोई ससुराल नहीं आया है। यहाँ तो बस मेरी ही चलती है।
वह बहादुर धीरे से मुस्कुराया भर..
उसकी इस हँसी ने जैसे जलती अग्नि में घी डालने का काम कर दिय…

क्या मिला क्या खो गया।

क्या मिला क्या खो गया
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"सुन राजू क माई !!
हम बिशनवा के साथ गोबरधन परिकरमा के लिए जा रहे हैं।"
"अरे ! हमको भी लिए चलते ना।"
नहीं राजू की माई ! अबकी शरद पूरनिमा का प्रोग्राम बना है, हमका जाए दो। अगले महीना हम तोहरा के ले चलेंगे; ठीक है ना ?"
"अब आप बनाईए लिए हैं प्रोग्राम, त ठीक है, पर हमरी बड़ी इच्छा थी गोवर्धन परिक्रमा की।"
"हम आठ-नौ महीना में रिटायर होइए रहे हैं बस उकरे बाद घूम के आएँगे मथुरा-बिरिन्दाबन भी।"
ठीक है, जाइए। रूपवती मुस्काई।
दोनों मित्र बाइक से स्टेशन के लिए निकले। कुछ ही दूर गए कि टायर फट गया।
बाइक असंतुलित हो पीछे से आते हुए एक ट्रोले की चपेट में आ गई।
बिशन को हल्की चोटें थी पर धरमचंद अब भी बेहोश था।
ट्रोले का ड्राइवर पकड़ा गया। लोगों ने उसे अस्पताल में पहुँचा दिया। रोती पीटती माँ के साथ उसके दोनों बेटे अस्पताल पहुँचे। बदहवास से...।
जाँच में पता चला 'मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर।'
बड़ा खर्च आएगा और डिसीजन भी जल्दी लें। डॉक्टर ने कहा।
"जी...हम बताते हैं।"
सुरेश को बाँह पकड़ कर राजेश एक ओर ले गया।
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कहानी--अब सब ठीक है

अब सब ठीक है
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सीधा, सच्चा और बुद्धिमान रोहन असिस्टेंट इंजीनियर बन गया था। उसका लक्ष्य था पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से देश सेवा करना।
बचपन से सुनता आ रहा था भ्रष्टाचार के बारे में, अब मन में इस बुराई से समाज को मुक्त करने की इच्छा थी..सो जुट गया। उसने अपने आपको पूरी तरह से काम में झोंक दिया था। अपनी मेहनत से गाँव के युवकों को प्रेरित करके उसने कुछ ही समय में गाँव का कायाकल्प कर दिया था।
आज बहुत उत्साहित था वो। कुछ ही दिन में गाँव में मंत्री जी का दौरा था। मंत्री महोदय के लिए गाँव के सरकारी स्कूल में खाना बनाने की तैयारी की उसने। पैसे भी अपने पास से ही खर्च किये। पूड़ियाँ, और दो तरह की सब्जी।
मंत्री जी को मूल समस्याओं से अवगत कराने के लिए गाँव में किए गए कार्य प्रोजेक्ट का नक्शा उसने स्वयं तैयार किया था। उसमें गाँव के लिए फ्यूचर प्लान भी थे और पेयजल और शौचालय समस्या के समाधान व सुझाव भी, जो वह मंत्रीजी जो बताना चाहता था।
दौरे के कुछेक दिन पहले मंत्रीजी के सचिव ने आकर पोजीशन ली। गाँव की तैयारी के बारे में पूछा।
"क्या है ये?? ये सड़ा-गला सा प्रोजेक्ट।"
"सर !!…