संदेश

क्या मिला क्या खो गया।

क्या मिला क्या खो गया
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"सुन राजू क माई !!
हम बिशनवा के साथ गोबरधन परिकरमा के लिए जा रहे हैं।"
"अरे ! हमको भी लिए चलते ना।"
नहीं राजू की माई ! अबकी शरद पूरनिमा का प्रोग्राम बना है, हमका जाए दो। अगले महीना हम तोहरा के ले चलेंगे; ठीक है ना ?"
"अब आप बनाईए लिए हैं प्रोग्राम, त ठीक है, पर हमरी बड़ी इच्छा थी गोवर्धन परिक्रमा की।"
"हम आठ-नौ महीना में रिटायर होइए रहे हैं बस उकरे बाद घूम के आएँगे मथुरा-बिरिन्दाबन भी।"
ठीक है, जाइए। रूपवती मुस्काई।
दोनों मित्र बाइक से स्टेशन के लिए निकले। कुछ ही दूर गए कि टायर फट गया।
बाइक असंतुलित हो पीछे से आते हुए एक ट्रोले की चपेट में आ गई।
बिशन को हल्की चोटें थी पर धरमचंद अब भी बेहोश था।
ट्रोले का ड्राइवर पकड़ा गया। लोगों ने उसे अस्पताल में पहुँचा दिया। रोती पीटती माँ के साथ उसके दोनों बेटे अस्पताल पहुँचे। बदहवास से...।
जाँच में पता चला 'मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर।'
बड़ा खर्च आएगा और डिसीजन भी जल्दी लें। डॉक्टर ने कहा।
"जी...हम बताते हैं।"
सुरेश को बाँह पकड़ कर राजेश एक ओर ले गया।
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कहानी--अब सब ठीक है

अब सब ठीक है
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सीधा, सच्चा और बुद्धिमान रोहन असिस्टेंट इंजीनियर बन गया था। उसका लक्ष्य था पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से देश सेवा करना।
बचपन से सुनता आ रहा था भ्रष्टाचार के बारे में, अब मन में इस बुराई से समाज को मुक्त करने की इच्छा थी..सो जुट गया। उसने अपने आपको पूरी तरह से काम में झोंक दिया था। अपनी मेहनत से गाँव के युवकों को प्रेरित करके उसने कुछ ही समय में गाँव का कायाकल्प कर दिया था।
आज बहुत उत्साहित था वो। कुछ ही दिन में गाँव में मंत्री जी का दौरा था। मंत्री महोदय के लिए गाँव के सरकारी स्कूल में खाना बनाने की तैयारी की उसने। पैसे भी अपने पास से ही खर्च किये। पूड़ियाँ, और दो तरह की सब्जी।
मंत्री जी को मूल समस्याओं से अवगत कराने के लिए गाँव में किए गए कार्य प्रोजेक्ट का नक्शा उसने स्वयं तैयार किया था। उसमें गाँव के लिए फ्यूचर प्लान भी थे और पेयजल और शौचालय समस्या के समाधान व सुझाव भी, जो वह मंत्रीजी जो बताना चाहता था।
दौरे के कुछेक दिन पहले मंत्रीजी के सचिव ने आकर पोजीशन ली। गाँव की तैयारी के बारे में पूछा।
"क्या है ये?? ये सड़ा-गला सा प्रोजेक्ट।"
"सर !!…

महाभारत ३७ वीं कड़ी

(आज...मन बड़ा प्रसन्न है। ईश्वर की कृपा से जब इस देवग्रंथ महाभारत की कहानियों को सरल हिंदी में लिखने का दुरूह कार्य आरम्भ किया था तो उसका एक बहुत बड़ा उद्देश्य यह भी था कि अपनी इस क्षुद्र मायिक बुद्धि से भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र संकीर्तन का क्षणमात्र प्रयास कर सकूँ। बिना भगवत्कृपा के यह आरम्भ ही न हो पाता। आज की इस कड़ी से कृपानिधान योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य, पदार्पण व प्रादुर्भाव होगा और मेरी कामना की पूर्ति भी। जय श्रीकृष्ण🙏)

पांडवों ने तीव्र गति से पांचाल की ओर अपनी यात्रा आरम्भ कर दी थी। वे शीघ्र ही द्रौपदी के स्वयंवर में पहुंचना चाहते थे। तरह-तरह के मांगलिक शकुन उनके मार्ग में होने लगे थे। पांचाल पास ही था। राज्य की समृद्धि उन्हें अनुभूत होने लगी थी। भरे हुए सुंदर जलाशय, दोनों तरफ के रास्तों पर सुंदर सुगंधित पुष्प वाटिकाएँ मन को मोहित करने में पूर्णतया सक्षम थीं।
कुछ दूर चलने पर उन्हें एक तरफ से आता हुआ ब्राह्मणों का समूह दिखाई दिया। पांडवों ने उन्हें प्रणाम किया। ब्राह्मणों ने पांडवों को ब्राह्मण वेष में देख कर उधर जाने का प्रयोजन पूछा और प्रसन्न हुए। उन्होंने बताया…

महाभारत ३६ वीं कड़ी

महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र और कामधेनु गऊ की कहानी
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समय की अबूझ गति विधाता के अतिरिक्त और कौन जान सकता है। आज पुनः वे कुछ कौतुक गढ़ने के लिए तत्पर थे। समय अब पांडवों को साथ लेकर एक नव इतिहास के लेखन में निमग्न हो रहा था।
गंधर्वराज चित्ररथ पांडवों को आर्यावर्त की विमुग्ध कर देने वाली कथा का इतिहास सुनाता था। उसे भी पांडव सरीखे श्रावकों के समक्ष
प्रवक्ता बनने का सौभाग्य मिला था। उसने महर्षि वशिष्ठ की कथा सुनाई।
सृष्टि के रचयिता परमपिता ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे महामुनि वशिष्ठ। काम और क्रोध सहित सभी इंद्रियों को वश में रखने के कारण इनका नाम वशिष्ठ हुआ।
महाप्रतापी महाराज इक्ष्वाकु ने एकबार ब्रह्माजी से पुरोहित के रूप में महर्षि वशिष्ठजी को माँग लिया।
ब्रह्माजी ने भी लोकहित की इच्छा से वशिष्ठ जी को इक्ष्वाकुवंशी राजाओं का पौरोहित्य कार्य करने का आदेश दिया।
वशिष्ठ राजाओं के साथ रहकर करने वाले इस कार्य को अच्छा नहीं समझते थे, वे तो परम् साधना में लीन रहना चाहते थे, परंतु ब्रह्माजी के यह बताने पर कि इसी वंश में भगवान स्वयं श्रीराम के रूप में अवतार लेंगे, …

महाभारत-२७

ये जो समय है न..
चिरयुवा...
बस चलता ही जाता है।
कभी भी..किसी के लिए रुकता नहीं है।
यह अपनी गति भी कभी बदलता नहीं...।
दुःख की घड़ी में इसकी गति कम और सुख में अधिक जान पड़ती है बस..होती नहीं।
हस्तिनापुर में भी समय बस बढ़ा ही जा रहा था...
निरंतर..
कुछ वर्ष और बीत गए थे..।
राजकुमार युधिष्ठिर साक्षात धर्म ही तो थे।
प्रजा से मिलते, विनम्रतापूर्ण व्यवहार करते, उनकी कुशलक्षेम पूछते और यथासंभव सहायता करते, यह उनका दैनिक नियम बन गया था।
उन्होंने अपने कुशल व्यवहार, शील, सदाचार, सत्यपालन और धर्मपरायणता से प्रजा के हृदय में ऐसा स्थान बना लिया था जो कभी राजा पाण्डु और धृतराष्ट्र भी न बना सके थे।
प्रजाजन की भावनाओं को समझते हुए तथा भीष्म और विदुर के कहने पर राजा धृतराष्ट्र ने पांडुनंदन युधिष्ठिर को युवराज पद प्रदान कर दिया।
भीम को गदा अत्यंत प्रिय थी सो उसने बलरामजी से खड़ग व गदा युध्द की शिक्षा लेनी प्रारम्भ कर दी।
अर्जुन धनुषप्रेमी थे। उन्होंने क्षुर, नाराच, भल्ल और विपाठ प्रकार के ऋजु, वक्र और विशाल बाणों का संधान करना और उन सबके गूढ़ तत्वों का संचालन सीख लिया।
निरंतर कड़े अभ्यास के चलते उसने निद्रा क…

द परफेक्ट प्लानर

द परफेक्ट प्लान
   एक फाइनेंस कंपनी का वह प्लानर था।
परफेक्ट प्लानर..।
जो प्लान वह बनाता... हिट हो जाता।
आज उसे 'मैन ऑफ द ईयर' का अवार्ड मिला था।
नौकरी के पहले ही साल में अपनी योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने की क्षमता, अच्छे स्वभाव और कड़ी मेहनत से उसने अपने ब्रांच हेड का दिल जीत लिया था।
उसके प्लान और सलाह से कम्पनी को लाखों के नए ऑर्डर मिल गए थे।
सो...बड़ा प्रमोशन उसे मिला।
...और उसकी सैलरी भी हजारों में बढ़ गई।
अपनी पत्नी को पास बैठा लिया उसने,
बोला- "डार्लिंग! देखा तुमने!
मेरे सारे प्लान परफेक्ट होते हैं। दुनिया सलाह लेती है मुझसे।
आज मैं तुम्हें अपना आगे का प्लान बताता हूँ।
अब.. पैसा तो बहुत है अपने पास।
चाहे डोनेशन देना पड़े..अपने छोटू को हम बेस्ट स्कूल में पढ़ाएँगे।"
"मैं एक करोड़ का टर्म इंश्योरेंस लूँगा।
छोटू का और तुम्हारा भविष्य सुरक्षित हो जाएगा।
म्यूच्यूअल फंड में हर महीने मैं बीस हजार रूपए डालूँगा।" यह भविष्य का निवेश होगा।
हम एक अच्छा सा मकान खरीदेंगे, कंपनी होम लोन दे ही रही है। इनकम टैक्स में भी छूट मिल जाएगी।"
"जिंदगी के सारे पासे अब सी…

..लायक बेटा

...लायक बेटा
    उसने कड़ी मेहनत करके सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला पाया।
खेतिहर मजदूर माता-पिता ने मेहनत मजदूरी कर-करके उसे पढ़ाया, सब खर्चे उठाए।
जब वो पैदा हुआ..तो कर्जा करके पूरे गाँव मे लड्डू बंटवाए थे।
वह हमेशा अपने माँ-बाऊजी को खुश रखना चाहता था।
....फिर कई सालों के स्ट्रगल के बाद उसे शहर में एक ठीक-ठाक सी नौकरी मिल गई।
लायक बेटा माँ-पिता को शहर ले आया।
बेटे के साथ दोनों बड़े प्रसन्न।
किराए पर एक मकान ले लिया, ऐसा लगा मानो दुख के दिन अब जा चुके थे।
दिन आराम से गुजरने लगे।
...और फिर उस बेटे ने अपने ऑफिस की एक सुंदर सी लड़की से शादी कर ली।
कुछ दिन ही तो बीते थे...।
गाँव के गँवार सास-ससुर को झेलना उसकी पत्नी को पसंद नहीं आया।
अब वह उन्हें वापस गाँव में छोड़ आया है।
बेटे ने ही बताया--
"माता-पिता की इच्छा है, उनका अंतिम समय गाँव में ही गुजर जाय।"
...विश्वास दिलाकर आया है..पैसे वो उन्हें भेजता रहेगा।