सामवेद से...

नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः। अमैरमित्रमर्दय।।2/1samved
हे अग्नि देव! आप सामर्थ्यवान एवं अतुलनीय पराक्रम वाले हैं, इसलिए समस्त साधकजन आपको नमस्कार करते हैं। आप अहितकरियों के विनाशक हैं, उनका संहार करें।

उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्।3/11samved
संसार को सूर्य का दर्शन बोध करने के लिए, उसकी किरणों जातवेद(सूर्य) से जिसकी उत्पत्ति समझी जाती है-वे ऐसे ही अग्निदेव को धारण किए रहतीं हैं।

शं नो देवीरभिष्टये शं नो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः। 3/13 samved
हमें सुख शांति प्रदान करने वाला जल प्रवाह प्रकट हो। वह जल पीने योग्य, कल्याणकारी एवं सूखकर हो।
(ध्यान दें कि सामवेद का अग्नि को समर्पित यह मंत्र जल के लिए है। संशय नहीं होना चाहिए । हमारे ऋषियों ने पहले ही यह खोज कर ली थी की जल का स्रोत भी अग्नि ही है और बाद में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने हमारे वेदों को डिकोड कर अग्नि ईंधन हाइड्रोजन और वायु अर्थात आक्सीजन के संयोग से H2O बनता है बताया।)

सोमं राजानं वरुणमग्निमन्वारभामहे।
आदित्यं विष्णु सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्।10/1सामवेद
हम श्रेष्ठ श्रुति के माध्यम से राजा सोम, वरुण, अग्नि, आदित्य, विष्णु, सूर्य, ब्रह्मा और बृहस्पति का आवाहन करते हैं।

प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तरति वाजकर्मभिः। यस्य त्वं सख्यमाविथ ।12/2
हे अग्निदेव! आप जिसके मित्र बनकर सहयोग करते हैं, वे स्तोतागण आप से श्रेष्ठ सन्तान, अन्न, बल आदि समृद्धि प्राप्त करते हैं।

भद्रो नो अग्नि राहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः। भद्रा उत प्रशस्तयः।12/5
हवियों से संतुष्ट हुए हे अग्निदेव! आप हमारे लिए मंगलकारी हों। है ऐश्वर्यशाली! हमें कल्याणकारी धन प्राप्त हो और स्तुतियाँ हमारे लिए मंगलमयी हों।


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