गिल्ली गिलहरी

गिल्ली गिलहरी
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उस छोटे से बगीचे में वह रहती थी...
अपने दोनों बच्चों के साथ।
नाम था गिल्ली।
बिना कोलाहल, बड़े सुकून और शांति से...
कोई दुःख, कोई तकलीफ न थी उसे।
बड़े ही मजे में...
यह दुरूह जीवन कटा जा रहा था।
....तो वह भी ईश्वर को दोनों हाथ जोड़कर धन्यवाद देती,
पूरा दिन फुदकती रहती थी।
हाँ... वह एक छोटी सी गिलहरी थी।
बगीचे के कोने में...
एक बड़े नीम के छोटे से कोटर में रहती,
वहीं के अमरूदों-आम और बेर-जामुनों को कुतरती और निश्चिन्त होकर भगवान का भजन करती।
उसके अच्छे दिन ही थे ये।
सुबह होते ही ढेर सारे पंछी...
और शाम होते ही खेलते बच्चे...
उसके जीवन में रंग भर देते थे, इसलिए सदैव प्रसन्न रहना उसकी आदत बन चुकी थी।
सुबह पंछियों से बतियाती...।
सतरंगे पक्षियों की तारीफ करती तो वे भी उसकी पीठ की सुंदर धारियों की तारीफ करते। वह गर्व से भर जाती.. ।
बताती...
...कि यह तो श्री रामजी ने उसकी पीठ पर प्रेम से उंगलियाँ फिराई, उसकी निशानी है।
फिर एक दिन....
उसके जीवन में जैसे भूचाल आ गया।
नगर निगम के कर्मचारी आज उस बगीचे में पहुँचे थे।
नई सरकार ने विकास के लिए उस बगीचे में सामुदायिक भवन बनाने को मंजूरी दे दी थी।
बगीचे के बहुत सारे पेड़ अब कट जाएँगे,
उसमें उसका आशियाना भी होगा क्या?
जीवन में प्रथम बार चिन्तित हुई थी वो।
गुस्सा भी संभवतः पहली बार ही आया था उसे।
यह कैसा विकास है?
प्रकृति को नष्ट करके...
किसी का घर उजाड़ कर विकास?
अभी कल ही तो 'मन की बात' में उसने सुना था।
अपने प्यारे प्रधानमंत्री जी को...
पक्षियों के लिए परिंडों में दाना और पानी रखने के लिए उन्होंने कहा था।
...और उसने सोचा था कि..
कितने करुणामय प्रधानमंत्री हैं अपने..
पर उनके नीचे के ये नौकरशाह...
कितने क्रूर, निष्ठुर...
न जाने कितनी बददुआएँ उसके मुँह से निकली।
आज ही शाम को में इसका इलाज करके रहूँगी।
आने दो शाम को बच्चों को।
उनके लैपी से मैं ट्विटर पर भेजूँगी अपनी शिकायत।
प्रधानमंत्री जी को और उनके कार्यालय को भी।
और यहाँ के अधिकारियों....
सबको भी...सssब को...।
मुझे पता है...
सुना है मैंने,
शिकायतों को बड़े ध्यान से सुनकर...
पढ़कर...
उसपर जरूर कार्यवाही की जाती है।
मेरा घर...मेरे पेड़...
...और मेरे सपने को मैं ऐसे ही टूटने नहीं दे सकती।
दॄढ विश्वास के साथ उसने सिर हिलाया और अपने कोटर में प्रवेश कर गई।
निकृष्ट और निर्दयी मनुष्य अपनी सदाशयता तो छोड़ ही चुका है।
न वह स्वयं चैन से रहता है और न किसी को रहने देता है।




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