छान्दोग्योपनिषद् (द्वितीय प्रपाठक, त्रयोदश खण्ड से चतुर्विंश खण्ड सम्पूर्ण) हिंदी भावार्थ सहित

                               त्रयोदश खण्ड


उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ २. १३. १

स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते
सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २. १३. २ ॥
स्त्री तथा पुरुष के परस्पर संसर्ग का प्रतिक्षण भी हिंकार, प्रस्ताव व उद्-गीथ रुपी वामदेव्य साम ही है। इन्हें पति व पत्निव्रत धारण करना चाहिए।  
 ऐसे वामदेव्य साम को जानने वाले सद्-गृहस्थ को वेद मिथुन कहा जाता है। ऐसे दम्पति का आपस में वियोग नहीं होता, अर्थात वे विधुर या विधवा नहीं होते। विवाहित से ही उत्पन्न होते हैं, दीर्घायु होते हैं और महान कीर्तिवान होते हैं। इनके लिए परस्त्री पर कुदृष्टि न डालना तथा किसी भी प्रकार के व्यभिचार से दूर रहना ही व्रत है।
        चतुर्दश खण्ड
उद्यन्हिंकार उदितः प्रस्तावो मध्यंदिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद्बृहदादित्ये प्रोतम् ॥ २. १४. १ ॥

स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १४. २ ॥
    सूर्योदय के पूर्व का उषाकाल हिंकार, उदित सूर्य प्रस्ताव, मध्यान्ह ही उद्-गीथ, इसके बाद का प्रहर प्रतिहार तथा सूर्य का अस्ताचल को जाना ही निधन है।
यह वृहद्-आदित्य साम है । जो इसे इस प्रकार से जान लेता है, परम तेजस्वी तथा अन्नवान होता है। अपनी पूर्ण आयु भोगता है, महान प्रज्ञावान, पशुवान और र्कीर्तिवान होता है।  परम तेज वाले सूर्य की उपेक्षा और निंदा न करना ही उसका व्रत है।
         पञ्चदश खण्ड


अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम्
॥ २. १५. १ ॥

स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाँश्च सुरूपँश्च पशूनवरुन्धे
सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १५. २ ॥

इधर-उधर विचरते छोटे-छोटे बादलों का समूह हिंकार, मेघ बनकर घुमड़ना प्रस्ताव, वर्षा ही उद्-गीथ, विद्युत का गर्जन व चमकना प्रतिहार तथा वर्षा की समाप्ति निधन है ।
वेदों में गाया जाने वाला यह वैरूप साम है । जो इसको जान लेता है, अत्यंत सुरूप पशुवान होता है। अपनी सम्पूर्ण आयु भोगता है, महान प्रज्ञावान और र्कीर्तिवान होता है।  बरसते मेघों की निंदा न करना ही उसका व्रत है।
 
 षोडश खण्ड

वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम् ॥ २. १६. १

स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति
ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यर्तून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १६. २


 वसंत ऋतु हिंकार, ग्रीष्म प्रस्ताव, वर्षा उद्-गीथ, शरद प्रतिहार तथा हेमंत ऋतु ही निधन है ऐसा ऋतुओं का वैराज साम कहता है।
वेदों में ऋतुओं के साम को वैराज साम कहा गया है। जो इसको जान लेता है, प्रजा, पशु एवं ब्रह्मतेज से युक्त होकर अपनी सम्पूर्ण आयु जीता है, महान प्रज्ञावान और र्कीर्तिवान होता है।  प्रत्येक ऋतु में भगवान की ही महिमा को जानना और किसी भी ऋतुओं की निंदा न करना ही उसका व्रत है।
  सप्तदश खण्ड

पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो
लोकेषु प्रोताः ॥ २. १७. १ ॥

स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १७. २


यह पृथ्वी हिंकार, अंतरिक्ष प्रस्ताव, द्युलोक उद्गीथ, दिशाएँ प्रतिहार तथा समुद्र निधन है ।
यह शक्वरी साम के नाम से जान कर सम्पूर्ण प्रकृति को साम स्वरुप समझने वाला भगवान के परम लोक को प्राप्त करता है।  किसी भी लोक की निन्दा न करना ही उसका व्रत है।  
              
       अष्टादश खण्ड
अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः ॥ २. १८. १ ॥

स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान्भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति
महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. १८. २ ॥

 बकरी हिंकार, भेड़ प्रस्ताव, गायें उद्-गीथ, घोड़े प्रतिहार तथा पुरुष निधन हैं।
यह रेवती साम है। उसे नाना प्रकार की योनियों में भगवान के दर्शन करने चाहिए और पशुओं की निन्दा कभी नहीं करनी चाहिए।
         एकोनविंश खण्ड

लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो माँसमुद्गीथोस्थि प्रतिहारो मज्जा  निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ॥ २. १९. १ ॥

स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥ २. १९. २ ॥
लोम हिंकार, त्वचा प्रस्ताव, मांस उद्-गीथ, अस्थि प्रतिहार तथा मज्जा निधन हैं।
यह यज्ञा-यज्ञीय साम के रूप में मनुष्य के शरीर के सभी अंगों में ओत-प्रोत है। यह मात्र भगवान की महिमा के कारण ही संभव है ऐसा समझना चाहिए।
यह यज्ञा-यज्ञीय साम जानने वाला कभी किसी अंगों से कुरूप नहीं होता है।   माँस–मज्जा न खाना ही उसका व्रत है।  

विंश खण्ड

अग्निर्हिंकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम् ॥ २. २०. १ ॥

स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाँसलोकताँसर्ष्टिताँसायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २. २०. २ ॥
अग्नि हिंकार, वायु प्रस्ताव, सूर्य उद्-गीथ, नक्षत्र प्रतिहार तथा चन्द्र निधन हैं।
इस राजन नाम के साम का उपासक सर्व सिद्धि-समृद्धि, देवलोक तथा भगवान का सायुज्य प्राप्त करता है। ब्राह्मणों की निन्दा न करना ही उसका व्रत है।  

एकविंश खण्ड

त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयाँसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतम् ॥ २. २१. १

स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्वँ ह भवति ॥ २. २१. २ ॥
त्रि-विद्या (वेद-त्रयी) हिंकार, त्रिलोक प्रस्ताव, आदित्य-अग्नि-वायु उद्-गीथ, नक्षत्र-पक्षी व सूर्य-किरण का प्रकाश प्रतिहार तथा सर्प-गन्धर्व-पितर निधन हैं। इन सब को साम समझने वाला स्वयं साममय हो जाता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं से तृप्त हो जाता है।

तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणी-त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति ॥ २. २१. ३ ॥

इस सम्बन्ध में श्लोक है कि- उपरोक्त इन तीन-तीन के समूहों में जो साम कहा गया है, इनसे बड़ा कोई दूसरा साम नहीं है ।   

यस्तद्वेद स वेद सर्वँ सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासित तद्व्रतं तद्व्रतम् ॥ २. २१. ४ ॥
जो इस साम को समझ गया है वह सभी साम को जान गया है ऐसा समझना चाहिए। सभी दिशाएँ उसके लिए शुभ हो जाती हैं। वह सभी विद्याओं का ज्ञाता हो जाता है। उसे सम्पूर्ण, सर्वत्र सुख की प्राप्ति होती है। मैं पूर्ण हूँऐसी भावना रखना ही उसका व्रत है।

         द्वाविंश खण्ड

विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः
प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः
श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं
वरुणस्य तान्सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ २. २२. १ ॥
     पशु स्वरों का विनर्दि साम, अग्नि का उद्-गीथ, प्रजापति का अनिरुक्त (अस्पष्ट) साम है, सोम का साम निरुक्त है, वायु का कोमल और मृदु, इंद्र का रस वाला और बलवान, बृहस्पति का क्रोंच पक्षी के स्वर सामान, वरुण का कर्कश (फूटे कांसे के पात्र के सामान झॉ-झॉ की ध्वनि) है। अतः अग्नि आदि सभी देवों के साम को गाना चाहिए परन्तु वरुण साम को गाना वर्जित है। इसे त्याग देना चाहिए।  

अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत्स्वधां
पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः
स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि
मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २. २२. २
        साम को मन से गाकर तथा प्रमाद मुक्त होकर वर की इच्छा रखने वाले उपासक को देवताओं के लिए मोक्ष, पितरों के लिए स्वधा, मनुष्यों के लिए आशा, पशुओं के लिए जल व तृण(चारा), मनुष्यों के लिए स्वर्ग व अपने लिए अन्न की प्रार्थना करनी चाहिए।

सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मानः सर्व ऊष्माणः
प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं
यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रँशरणं प्रपन्नोऽभूवं
स त्वा प्रति वक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ २. २२. ३
सभी स्वर (अ, इ, उ आदि) इंद्र की आत्मा स्वरुप हैं। सभी ऊष्म-वर्ण(श, स, ष, ह आदि) प्रजापति की आत्मा स्वरुप, स्पर्श-वर्ण (क्, ख, ग आदि) यम की आत्मा स्वरुप है। यदि स्वरों के साथ साम का गान करने वाले को कोई स्वरों का अभिमानी व्यक्ति उच्चारण सही न होने का उलाहना दे तो भी उपासक को अपने ज्ञान का अहंकार नहीं करना चाहिए और यह कहना चाहिए कि मैं तो इंद्र भगवान की शरण में हूँ, उसी के ध्यान में भजन कर रहा हूँ। उसी की प्रेरणा से सभी मनुष्यों को स्वर ज्ञान मिल सका है। स्वरों का सम्पूर्ण ज्ञान तो उसी ईश्वर को ही है। अतः वही तुमको सही स्वरोचारण बता सकता है।   

अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिँशरणं
प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति पेक्ष्यतीत्येनं
ब्रूयादथ यद्येनँ स्पर्शेषूपालभेत मृत्युँ शरणं
प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रति धक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात्
॥ २. २२. ४
यदि कोई स्वरों का अभिमानी व्यक्ति ऊष्म वर्णों में उलाहना दे तो उपासक को यह कहना चाहिए कि मैं तो प्रजापति के ध्यान में हूँ, उसी की स्तुति कर रहा हूँ। वही तुम्हारे अहंकार को चूर्ण कर सकता है। यदि कोई स्पर्श-वर्णों में उलाहना दे तो उपासक को यह कहना चाहिए कि मैं तो यम के ध्यान में हूँ, उसी का गान कर रहा हूँ। वह तुम्हारे अभिमान को दग्ध कर देंगे।  
सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं
ददानीति सर्व ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता
वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा
लेशेनानभिनिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं
परिहराणीति ॥ २. २२. ५
सभी स्वरों का जोर-जोर से पूरे उत्साह और आत्मविश्वास के साथ गान करना चाहिए। उपासक यह कहे कि मैं इन स्वरों का अभिमान न करके इंद्र को इनका बल प्रदान करता हूँ। इसी प्रकार ऊष्म स्वर का गान भी सुस्पष्ट हो तथा उपासक इस ज्ञान को प्रजापति को समर्पित करे । स्पर्श-वर्ण सु-उच्चारित हो और उपासक इसके ज्ञान का श्रेय यम को देवे। यह कहा जाना सही है कि किसी भी प्रकार उपासक अपने ज्ञान का गर्व कभी न करे।    
त्रयोविंश खण्ड

त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप
एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी
तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्सर्व
एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसँस्थोऽमृतत्वमेति ॥ २. २३. १ ॥
   धर्म के तीन स्कन्ध है- यज्ञ, अध्ययन और दान प्रथम स्कन्ध है । तप द्वितीय तथा ब्रह्मचर्य का पालन तृतीय। यह पुण्य लोक प्रदायक है। इनके साथ जो ब्रह्म के ध्यान में लगा रहता है, वह अमृत प्राप्त करता है।
 
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या
संप्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि
संप्रास्र्वन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २. २३. २

 प्रजापति ने सृष्टि की रचना की और तप और ज्ञान से वेद-त्रयी उत्पन्न हुए । इस त्रयी विद्या को भगवान ने अभितप्त किया और तब इससे तीन अक्षर भू:, भुवः और स्वः उत्पन्न हुए।  

तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि
संतृण्णान्येवमोंकारेण सर्वा वाक्संतृण्णोंकार एवेदँ सर्वमोंकार एवेदँ सर्वम् ॥ २. २३. ३ ॥

भगवान ने पुनः इन तीनों को अभितप्त किया और इनसे ॐ को उत्पन्न किया। जैसे ताने और शाखाओं के साथ सारे पत्ते बंधे रहते हैं वैसे ही ॐकार से सारी वाणी बंधी हुई है और ॐ में ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बद्ध है। अतः सब कुछ यह ॐकार ही है।
 
       
         चतुर्विंश खण्ड


ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातः सवनँ रुद्राणां
माध्यंदिनँ सवनमादित्यानां च विश्वेषां
देवानां तृतीयसवनम् ॥ २. २४. १

  ब्रह्मवादी विद्वान कहते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त में भगवत प्राप्ति के लिए किया जाने वाला ध्यान, पाठ, पूजा, यज्ञ और स्तुति सर्वश्रेष्ठ है।इस यज्ञ का फल पृथ्वी लोक प्रदायक है और अष्ट वसुओं का है।  मध्यान्ह का समय घोर तप करने वालों के लिए उपयुक्त है, यज्ञ का फल अंतरिक्ष लोक का है और ग्यारह रूद्र देवताओं का भाग है। इसके बाद के प्रहर (सायंकाल) में जो सवन किया जाता है वह स्वर्ग लोक के लिए तथा द्वादश आदित्यादि तथा दस विश्वदेवों के लिए किया जाता है।   

क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात्कथं
कुर्यादथ विद्वान्कुर्यात् ॥ २. २४. २ ॥

तब यजमान और उपासक को किस लोक में स्थान प्राप्त होता है? यदि उसे नहीं पता तो वह विद्वान कैसे और क्या स्तुति कर सकता है? अतः साम गान तथा इसकइ सम्पूर्ण ज्ञान को जान कर ही उपासक को सवन-कर्म करने चाहिए।
 

पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघनेन
गार्हपत्यस्योदाङ्मुख उपविश्य स वासवँ
सामाभिगायति ॥ २. २४. ३ ॥

वह प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में अपनी स्तुति आरम्भ करने से पूर्व ही गार्हपत्य अग्नि को सम्मुख रखकर और उत्तराभिमुख बैठकर वासव नामक साम का गान करता है।


लो३कद्वारमपावा३र्णू ३३ पश्येम त्वा वयँ
रा ३३३३३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११
इति ॥ २. २४. ४

       उपासक को पृथ्वी के राज्य की कामना के लिए इस साम का गान करना चाहिये। हे भगवान! हमारे लिए सभी लोकों के द्वार खोल देवें, सम्पूर्ण धरा पर हम तेरे स्वरुप का ही दर्शन करें

अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते
लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक
एतास्मि ॥ २. २४. ५ ॥
      सामगान के साथ उपासक इस मन्त्र से यज्ञ की अग्नि में हवन करे- पृथ्वी लोक में निवास करने अग्नि देव को नमस्कार है। हे देव! मुझे इस लोक को आप प्राप्त करावें

अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि
परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनँ
संप्रयच्छन्ति ॥ २. २४. ६

    अपनी आयु पूर्ण कर लेने के पश्चात मैं इस लोक को प्राप्त करूँ, इस निमित्त यह आहुति देता हूँ। इस लोक के अर्गल का आप नाश करें। इस मन्त्र को कह जब वह उठ खड़ा होता है तब आठो वासु उसे यज्ञ का आशीर्वाद तथा सम्यक फल प्रदान करते है।

पुरा माध्यंदिनस्य
सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योदङ्मुख
उपविश्य स रौद्रं  सामाभिगायति ॥ २. २४. ७
मध्यान्ह के यज्ञ को आरम्भ करने के पहले ही वह दक्षिणाग्नि के पीछे उत्तराभिमुख बैठ कर रूद्रदेव के लिए रौंद्र साम का गान करे।

लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं
वैरा३३३३३ हु३म् आ३३ज्या ३यो३आ३२१११इति
॥ २. २४. ८

हे भगवान ! वैराज्य(अंतरिक्ष लोक) के द्वार हमारे लिए खोल दें । हम आपको वैराज्य के निमित्त देखें। इस प्रकार मन्त्र का गान करे। 

अथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते
लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक
एतास्मि ॥ २. २४. ९ ॥
यह जप करें वायु व अंतरिक्ष लोक में मैं यजमान के रूप में आप को नमस्कार करता हूँ। मुझे यह सभी लोक प्राप्त हों।

अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि
परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा
माध्यंदिनँसवनँसंप्रयच्छन्ति ॥ २. २४. १० ॥
मैं अपने अगले और पिछले सभी जन्मों में भी इसी प्रकार से आपका नमन करूँ। यह कह कर यज्ञ में आहुति डाले। अर्गल को भगवान दूर करें कहकर खड़ा हो जाये। ऐसे यजमान उपस्क को रूद्र का मध्यान्ह सवन प्राप्त होता है। 
पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख
उपविश्य स आदित्यँस वैश्वदेवँ सामाभिगायति
॥ २. २४. ११
तीसरे सवन में आदित्य व विश्व्देवों के आवाहन के लिए साम का गान करें। 
लो३कद्वारमपावा३र्णू३३पश्येम त्वा वयँ स्वारा
३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३ यो३आ ३२१११ इति
॥ २. २४. १२
लोकों के द्वार का ध्यान करके (स्वाराज्य) स्वाऽऽ हॅुऽऽ आऽऽ राऽऽ ज्याऽऽ योऽऽ आऽऽ प्रकार से स्वर में साम गान करे। 

आदित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम
त्वा वयँसाम्रा३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३यो३आ ३२१११
इति ॥ २. २४. १३ ॥

हे भगवान! हम आपको आदित्य स्वरुप सभी विश्व्देवों के साम्राज्य के लिए देखना चाहते हैं अतः हमारे लिए लोकों के द्वार खोल देवें।

अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो
दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय
विन्दत ॥ २. २४. १४ ॥
एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः
परस्तादायुषः स्वाहापहत परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति
॥ २. २४. १५ ॥
तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनँ
संप्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद
एवं वेद ॥ २. २४. १६ ॥
    राज्य, वैराज्य, स्वाराज्य और साम्राज्य के लिए चार प्रकार के मन्त्र हैं । इनका जप और यज्ञ करना चाहिए। नमो आदित्येभ्यो, नमो विश्वेभ्यो, नमो देवेभ्यो के सहस्त्र मन्त्र के साथ उपासक यजमान को वंदन करना चाहिए। इन मन्त्रों की तीनो सवनों में (प्रातः, मध्यान्ह व सायंकाल) आहुति और सभी पापों और बाधाओं को दूर होने की प्रार्थना के बाद उसे उठना चाहिए। इस प्रकार निरंतर अभ्यास करने से ही वह वेद को जानता है कि यही वेद है, यही वेद है।


 
                     द्वितीय प्रपाठक समाप्त

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