उपनिषद् Upanishad

                उपनिषद्
पुरातन काल से ही भारतवर्ष पूरे विश्व का आध्यात्मिक और धार्मिक गुरु रहा है। अनेक देशों से लोग आते और यहाँ के मुनियों-महात्माओं से समस्त प्रकार की शिक्षा प्राप्त कर अपने देशों में जाते और वहाँ इस ज्ञान का प्रचार करते थे। शिक्षा का माध्यम गुरुकुल हुआ करते थे। गांव-घर में हो या ज्ञानियों का जमावड़ा, चौपालें हों या राज दरबार, वन-उपवन, आश्रम, धर्मशालाएँ सभी जगहों पर वेदों की चर्चाएँ, उपनिषदों की कथाएँ, पुरानों की चर्चा और धर्म सम्बन्धी श्लोकों-स्तोत्रों का गायन होता था। यहाँ तक की वाद-विवाद तथा प्रतियोगिताओं का विषय भी वेद और धर्मग्रन्थ ही हुआ करते थे। लोगों की आम बोल चाल की भाषा भी संस्कृत ही थी अतः स्मृतियों-श्रुतियों पर आधारित पुस्तकें भी संस्कृत में ही लिखी व पढ़ी जाती थी। इससे लोगों को आत्मिक शान्ति तथा संतुष्टि का अनुभव होता था। संभवतया यही तो सतयुग था।
भारत के यही धर्मग्रन्थ असल मायने में बड़े ही गूढ़ और गंभीर विषयों का कोष हैं। पाश्चात्य सभ्यता के आगमन के साथ-साथ ही संस्कृत का प्रचलन कम होता चला गया और इन विषयों को अध्ययन की इच्छा रखने वालों के लिए भी संस्कृत को न समझने के कारण स्वाध्याय कठिन अवश्य हो गया है पर असंभव नहीं है। रूस, जर्मनी तथा ब्रिटेन के विद्वानों ने इन ग्रंथों को पढ़ने के लिए संस्कृत भाषा को अपनाया। इन्टरनेट के इस युग में सभी पुस्तकें लगभग प्रत्येक भाषा और रूपों में ढूँढने पर प्राप्त हो ही जाती हैं।
वेदों के उपदेश एक ओर तो यज्ञ कर्मों के द्वारा समझे जाते हैं, वेदों के पूर्व भाग में 80000 ऋचाओं के रूप में हैं। 16000 ऋचाएँ उपासना कर्म की हैं और 4000 ऋचाओं का  उत्तर भाग वहीँ दूसरी तरफ ब्रह्म ज्ञान के लिए प्रतिष्ठा भाग और ज्ञानमय सिद्धांत के रूप में इसका सार है। यही ‘वेदांत’ है और यही वेदों का गूढ़ तत्व तथा रहस्य भी। यही उपनिषद हैं। इन्ही उपनिषदों पर चर्चा करें।
  यह तो सत्य है कि उपनिषदों का ज्ञान केवल एक बार पढ़ने या श्रवण करने हेतु नहीं है। यह इतना गूढ़ और रहस्यमय है कि विद्वान पुरुषों के लिए भी एक बार में इसे समझना संभव नहीं है। हर बार पढ़ने-सुनने पर यह नया लगता है। इसका बार–बार पठन, चिंतन, श्रवण व आचरण करने से ही हर बार इसके रहस्य की एक-एक परतें खुलती चली जाती है और धीरे-धीरे सांसारिक माया से वैराग्य तथा ब्रह्मतत्व अर्थात भगवान से अनुराग आरम्भ हो जाता है। इस प्रकार इन उपनिषदों का रस ही मनुष्य मात्र के लिए राम-रसायन है। इसका रसपान करने वाले का जीवन सँवर जाता है। इसने मिथिला नरेश कुशध्वज को परम ज्ञानी योगी ‘जनक’ तथा नचिकेता जैसे पांच वर्षीय बालक को तत्ववेत्ता बना दिया। मुस्लिम शासक दाराशिकोह इन उपनिषद कथाओं से इतना प्रभावित हुआ कि उसने इन ग्रंथों का सन १६५५-५६ में इनका अनुवाद फारसी में कराया। फ्रेंच विद्वान ड्यू पैरों ने इनको पढ़ने के लिए संस्कृत का अध्ययन किया। राजाराम मोहनराय जैसे समाज सुधारकों, मैक्समूलर, रोअर, मिशेल, बोहतलिंक , पाल डयूसन आदि विद्वानों ने उपनिषदों का अपनी-अपनी भाषाओँ फ्रेंच, जर्मन, लैटिन तथा अंग्रेजी में अनुवाद कराया। जापान, जर्मनी और रूस में तो आज तक वेदों और उपनिषदों पर शोध कार्य हो रहे हैं। जर्मन शोवर हावर ने कहा था – यदि जीवन में मुझे किसी चीज से सच्ची शान्ति मिली है तो वे उपनिषद हैं और मृत्यु के समय भी यही मुझे शान्ति दे सकतीं है अतः निरंतर स्वाध्याय से इनका ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहना ही जीवन का लक्ष्य हो तो अच्छा।   
  

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