छान्दोग्योपनिषद (प्रथम प्रपाठक, प्रथम से त्रयोदश खण्ड सम्पूर्ण)

छान्दोग्योपनिषद् से...

सामवेद की जैमिनी, कौथुमी और राणायनी आदि शाखाओं का ब्राह्मण भी छान्दोग्य ही है। सामवेदीय उपनिषद के ताण्डय तलवकार महाब्राह्मण का ही एक अंश छान्दोग्योपनिषद है इसमें ४० प्रपाठक या अध्याय हैं। प्रथम २५ प्रपाठक या अध्याय को प्रौढ़ ब्राह्मण और अगले पांच को षड्विश ब्राह्मण कहते हैं। इसके साथ ८ प्रपाठक छान्दोग्योपनिषद और २ प्रपाठक मन्त्र ब्राह्मण मिलाकर ४० अध्याय ही तांडय महाब्राह्मण कहा जाता है। वेद के यही मन्त्र छन्दस् कहे जाते हैं और पढने और गान करने वाले ब्राह्मणो को छान्दोग। इनमें सात प्रमुख छंद होते हैं-गायत्री, उणिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती । इनके भी ८ प्रकार हैं -  आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजपत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची और ब्राह्मी। इस प्रकार कुल ५६ भेद कहे जाते हैं। इसके पश्चात भी ७ अतिछंद, ७ विछंद आदि के साथ अनेक भेद हो जाते हैं। इन्ही की संहिता ग्रन्थ को छान्दोग्य कहा गया। ज्ञान के यही रहस्य जो गुरु के समीप रहकर प्राप्त किये गए हैं, उपनिषद कहलाये। इनमें वेदों का तत्व-सिद्धांत और सार है, यही वेदांत हैं।
छान्दोग्योपनिषद का मंगलाचरण इस प्रकार है-
ॐ आप्यावान्तु ममांगानि वाक् प्राणश्चक्षु: श्रोत्रमथो बल मिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्व ब्रह्मौपनिषदम्। माहंब्रह्म निराकुर्याम्। मामा ब्रह्मनिराकरोद्। अनिराकरणं में अस्तु। अनिरा करणं में अस्तु।  तदात्मनि निरतेय उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु। ॐ शांति: ! शांति: ! शांति: !
हे परब्रह्म परमेश्वर! मेरे सर्वांग, वाणी, चक्षु, कर्ण, बल और सभी इन्द्रियाँ पुष्टता प्राप्त करें। समस्त प्रकार का ब्रह्म ज्ञान इन उपनिषदों में ही है। मैं उस ब्रह्म की, ब्रह्मज्ञान की उपेक्षा कदापि न करूँ। जिससे मेरी उपेक्षा न हो। हे ब्रह्म! मेरी उपेक्षा न हो। जब मेरी आत्मा शांत हो जावे तो उपनिषदों में वर्णित वे सभी धर्म मुझमें आ जावें। वे सभी धर्म मुझमें ही निवास करें। मेरे सभी शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक दुःख दूर हो जावें और मुझे त्रिविध शांति प्राप्त हो जावे।    


प्रथम प्रपाठक
प्रथम खंड
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासितोमिति ह्युदगायति तस्यो पव्याख्यानम् ॥ १.१.१ ॥
साक्षात् परब्रह्म नारायण के परम पवित्र नाम ॐ के (उद्-गीथ नारायण के ओंकार नाम का पूरे राग, नाद और  तन्मयता के साथ गान) के साथ ही अपनी उपासना का आरम्भ करना चाहिए। ॐ का ही गान और व्याख्यान किया गया है ।
एषां भूतानां पृथ्वी रसः,पृथिव्या आपो रसोऽपामोषधयो रसः, औषधीनां पुरुषो रसः, पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रस ऋचः सामरसः साम्न उद्-गीथो रसः ॥ १.१.२ ॥
स एष: रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो यदुद्-गीथः॥ १.१.३ ॥
पञ्च भूतों का सार रस पृथ्वी, पृथ्वी का सार जल, जल का सार अन्नादि वनस्पतियाँ और औषधियाँ हैं, इन् का सार पुरुष, पुरुष का सार उसकी वाणी, वाणी का सार ऋग् अर्थात ईश्वर की स्तुति व उपासना है, ऋग् का सार साम, साम का सार ॐकार का गान है जो साक्षात् परब्रह्म नारायण के परम पवित्र नाम है।  इस प्रकार यह आठवाँ सार ॐकार ही सब सार का सार है, यह ईश्वर का परमप्रिय नाम है। यह परमसार, परम आनन्द और परमधाम है, ऐसा ही समझना चाहिए।
कतमा कतमक्-र्कतमत्कतमत्त्साम, कतमः कतम उद्-गीथ इति विमृष्टं भवति॥१.१.४॥
अब कौन ऋक् है, कौन साम और कौन उद्-गीथ है? इसका विमर्श होता है ।
वागेवर्क्, प्राणः सामो मित्येततदक्षरमुद्-गीथ:। तद्वा एतत् मिथुनम् यद्वाक् च प्राणश्चकं च साम च ॥ १.१.५ ॥
वाणी ऋक् है और साम प्राण, वाणी से स्तुति की जाती है जो प्राण शक्ति के कारण ही संभव है । वाणी स्त्री है और साम पुरुष। इस प्रकार यह युगल हैं। इस मिथुन रुपी युग्म के द्वारा भगवान विष्णु के नाम रूप ॐकार अक्षर का उद्-गीथ किया जाता है।
तदे तन्मिथुनमोमित्येततस्मिन्नक्षरे सग्वं सृजयेत यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतौ वै तावन्योन्यस्य कामम् ॥ १.१.६ ॥
उस पति पत्नी के रूप में वाक् और प्राण या ऋक् तथा साम अक्षर जब मिलकर मिथुन रूप से पूरी शक्ति और श्रद्धा के साथ भगवान की स्तुति गाते हैं तो यह सामगान है और मनुष्य पूर्ण काम-सिद्ध हो जाता है।
आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्-गीथ मुपासते ॥ १.१.७ ॥
इस प्रकार का ज्ञान करते हुए जो विद्वान मनुष्य साक्षात् परब्रह्म नारायण के परम पवित्र नाम इस ॐ उद्-गीथ की आराधना करता है उसकी निश्चय रूप से समस्त प्रकार की कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।
तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्वि किंचानुजानात्योमित्येव तदाहैषो एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्द्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्-गीथ मुपास्ते ॥ १.१.८ ॥  
ॐ ही अनुज्ञा अक्षर है जिसका एक अर्थ अनुमति प्राप्त करना भी है, ॐ कहते ही निश्चय होता है की अनुमति प्राप्त हो गयी है। यही समृद्धि और अनुग्रह भी है। ऐसा जानते हुए जो विद्वान मनुष्य इस ॐ उद्-गीथ की उपासना करता है वह भगवान हरी के भक्त के रूप में निश्चय रूप से समस्त प्रकार की कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।
तेनेयं त्रयीविद्या वर्तते ओमित्या श्रावयत्योमि तिशँसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवा -क्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन॥ १.१.९ ॥
इस ॐ उद्-गीथ की उपासना से ही उसकी प्रवृत्ति त्रयी विद्या (ऋक्, यजु और साम) की तरफ बढ़ती है। मन्त्र पाठ, श्रवण, स्तुति तथा होता या ऋत्विज (यजमान जिस आचार्य को यज्ञादि कर्मकांड हेतु नियुक्त करता है) द्वारा होम किया जाने वाला हव्य भी इसी उद्-गीथ प्रणव अक्षर के साथ ही पूर्ण होता है। ॐ ही उद्-गाता साम को गाता है, अर्थात इस अक्षर की पूजा के लिए इसी अक्षर की महिमा तथा रसानंद के द्वारा ही मनुष्यों के सारे कर्म पूरे होते है।
तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद। नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति ॥ १.१.१० ॥
कुछ मनुष्य ॐ की महिमा को जानते हैं और कुछ नहीं जानते, पर दोनों ही जो भी कर्म करते हैं वह सब इसी ॐ नाम की कृपा से ही सम्पूर्ण होता है। इस प्रकार ज्ञानी और अज्ञानी मनुष्य उसी भगवान के बनाये नियम के अंतर्गत ही अपने-अपने कर्म करते है। जो कर्म विद्या से किया जाय, जान-समझ कर, प्रभु के प्रति सच्ची आस्था, धारणा, श्रद्धा और विश्वास के साथ वेद विषयों के ज्ञान सहित पूर्ण किये जाये, वह कर्म अति बलवान होकर उत्तम फल प्राप्त कराते हैं ।

द्वितीय खंड
                  देवासुरा ह वै यत्र संयेतिरे उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा
          उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १.२.१
         देव तथा असुर दोनों ही प्रजापति के पुत्र थे। देवासुर संग्राम के समय देवगण वहाँ
         पर ॐ उद्-गीथ को इस विश्वास के साथ ले आये कि इसके प्रबल प्रताप के द्वारा हम
         असुरों से जीत जायेंगे।
    ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तँ हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं
    जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ १..२
देवताओं ने नासिका के अंदर उपस्थित प्राण के द्वारा साक्षात् परब्रह्म नारायण के ॐ कार नाम की उपासना आरम्भ की। असुरों को लगा कि अब हम हार जायेंगे और उन्होंने इस प्राण को पाप से बिद्ध कर दिया। तब से मनुष्य भी इस नासिकागत प्राण से दोनों को सूँघने लगा, सुगंध को भी और दुर्गन्ध को भी।
अथ ह वाचमुद्गीथमुपासांचक्रिरे ताँ हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति

सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ १.२.३ ॥

उसके बाद देवताओं ने वाणी के अंदर उपस्थित प्राण के द्वारा साक्षात् परब्रह्म नारायण  के ॐ कार नाम की उपासना आरम्भ की। तब असुरों को लगा कि अब हम हमारी हार तय है और उन्होंने वाणी को भी पाप से बिद्ध कर दिया। तब से मनुष्य भी वाणी से दोनों को बोलता है, सत्य को भी और असत्य को भी।
अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ १.२.४ ॥
अब देवताओं ने नेत्र के अंदर उपस्थित प्राण के द्वारा साक्षात् परब्रह्म विष्णु भगवान  के ॐ कार नाम की आराधना आरम्भ की। तब असुरों को लगा कि अब तो हम हार ही जायेंगे और उन्होंने नेत्र को भी पाप से बिद्ध कर दिया। तब से मनुष्य भी दोनों को देखता है, दर्शनीय को भी और उसे भी जो गलत हो।
अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयँ शृणोति

श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ १.२.५ ॥

इसके पश्चात देवताओं ने श्रोत अर्थात कानों के अंदर उपस्थित प्राण के द्वारा साक्षात् परब्रह्म नारायण के ॐ कार नाम की उपासना आरम्भ कर दी। अब तो असुरों को लगा कि हार सामने है और उन्होंने कानों को भी पाप से बिद्ध कर दिया। तब से मनुष्य भी दोनों को सुनने लगा, सुनने योग्य हो उसे भी और जो न सुनने लायक हो उसे भी।
अथ ह मन उद्गीथमुपासांचक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयँसंकल्पते

संकल्पनीयं चासंकल्पनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ १.२.६ ॥

तब देवताओं ने मन के अंदर उपस्थित प्राण को प्रधान मान कर मन के द्वारा साक्षात् परब्रह्म नारायण  के ॐ कार नाम की उपासना आरम्भ की। तब असुरों को लगा कि अब हम हार जायेंगे और उन्होंने नेत्र को भी पाप से बिद्ध कर दिया। इस कारण से मनुष्य भी दोनों को ही विचारता है, विचारने योग्य को भी और उसे भी जो विचारणीय न हो।
अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे तँहासुरा ऋत्वा

विदध्वंसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वँसेतैवम् ॥ १.२.७ ॥

यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वँसत एवँ हैव स विध्वँसते य एवंविदि पापं कामयते

यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माखणः ॥ १. २. ८

तब अंततः देवताओं ने मुख के मुख्य प्राण अर्थात ह्रदय में अँगुष्ठ स्थान पर निवास करने वाले आत्मा को प्रधान मान कर साक्षात् परब्रह्म नारायण  के ॐ कार नाम की उपासना की। असुरों ने इसे भी पाप से अशुद्ध करने का प्रयास किया परन्तु इसके परम बल के कारण वे असुर ऐसे गिर गए जैसे शिला से टकराने के पश्चात मिटटी का ढेला चूर-चूर हो जाता है।
इसी प्रकार भगवान का उपासक भी अभेद्य शिला के समान होता है और जो भी उस उपासक के पाप या अनिष्ट की कामना करता है या उसका हनन करना चाहता है, वह भी मिटटी के ढेले के समान ही स्वतः ही नष्ट हो जाता है।
नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येष तेन यदश्नाति यत्पिबति तेनेतरान्प्राणानवति एतमु एवान्ततोऽवित्त्वोत्क्रमति व्याददात्येवान्तत इति ॥१. २.९॥
मुख्य प्राण वस्तुतः पूर्ण रूप से निर्विषय होता है, पाप रहित होता है। वह सुगंध-दुर्गन्ध कुछ भी नहीं जानता। मनुष्य इस प्राण से जो कुछ भी शक्ति संचित करता है, उससे इन्द्रियों की रक्षा होती है, अर्थात यही मुख्य प्राण शरीर के दूसरे प्राणों का पालन करता है और रक्षक होता है, परन्तु मनुष्य इस प्राण रुपी आत्मा को अंत समय तक जान नहीं पाता और यह प्राण जब देह को छोड़कर बाहर जाने लगता है तब मूर्ख मनुष्य मॅुह फाड़ कर रोता है, कुछ भी कर नहीं पाता।   
तँ हाङ्गिरा उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसः ॥१.२.१०॥
तेन तँ ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासांचक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिः ॥१.२.११
तेन तँ हायास्य उद्गीथमुपासांचक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद्यदयते ॥१.२.१२॥
तेन तँह बको दाल्भ्यो विदांचकार ।स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः
कामानागायति ॥१.२.१३॥
आगाता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥१.२.१४॥
महर्षि अंगिरा, बृहस्पति, अयास्य, दाल्भ्य पुत्र वक आदि ऋषियों ने इसी मुख्य प्राण की उपासना की जिनके नाम पर इस प्राण को भी इन ऋषियों के नाम पर ही
अंगिरा, बृहस्पति, अयास्य और दाल्भ्यवक भी कहा जाता है।
तृतीय खण्ड
अथाधिदैवतं य एवासौ तपति
तमुद्गीथमुपासीतोद्यन्वा एष प्रजाभ्य उद्गायति
उद्यँस्तमो भयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य
तमसो भवति य एवं वेद ॥ १. ३. १
समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ
स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं
तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ १. ३. २
अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति
स प्राणो यदपानिति सोऽपानः ।
अथ यः प्राणापानयोः संधिः स व्यानो यो व्यानः
सा वाक्
तस्मादप्राणन्ननपानन्वाचमभिव्याहरति ॥ १. ३. ३ ॥
या वाक्सर्क्तस्मादप्राणन्ननपानन्नृचमभिव्याहरति
यर्क्तत्साम तस्मादप्राणन्ननपानन्साम गायति
यत्साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन्नुद्गायति ॥ १. ३. ४ ॥
अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाग्नेर्मन्थनमाजेः
सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानँस्तानि
करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमेवोद्गीथमुपासीत ॥ १. ३. ५ ॥
अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीतोद्गीथ इति
प्राण एवोत्प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग्गीर्वाचो
गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदँसर्वँस्थितम् ॥ १. ३. ६ ॥
द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य
एवोद्वायुर्गीरग्निस्थँ सामवेद एवोद्यजुर्वेदो
गीरृग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो
दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं
विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ १. ३. ७
अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत
येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ॥ १. ३. ८
यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां
देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥ १. ३. ९
येन च्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन
स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तँस्तोममुपधावेत् ॥ १. ३. १० ॥
यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥ १. ३. ११ ॥
आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं
ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृध्येत
यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १. ३. १२ ॥
इस खण्ड में भगवान श्री हरि की अधिदैवत उपासना का सार है, जो विश्व के पदार्थ सूर्य, चंद्र, आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष तत्व का नाम लेकर की गई है। पूर्व खण्ड में देह्गत पदार्थों चक्षु, श्रोत, वाक्, मन व ह्रदय से अनुभव किये जाने वाले ईश्वर की शक्ति उपासना का उपदेश है जिसे आध्यात्म उपासना कहते हैं ।
अष्टम खण्ड
त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति ते होचुरुद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १. ८. १ ॥
तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रावहणो जैवलिरुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचँ श्रोष्यामीति ॥ १. ८. २ ॥
स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति पृच्छेति होवाच ॥ १. ८. ३ ॥
का साम्नो गतिरिति स्वर इति होवाच स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ॥१.८.४॥
अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं लोकमिति नयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोकँ सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गसँस्तावँहि
सामेति॥१.८.५॥
तँ ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम
यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥१.८.६॥
हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवाचास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमिति नयेदिति होवाच
प्रतिष्ठां वयं लोकँ सामाभिसँस्थापयामः प्रतिष्ठासँस्तावँ हि सामेति ॥ १. ८. ७ ॥
तँ ह प्रवाहणो जैवलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥१.८.८॥
प्राचीन काल की कथा है- उद्-गीथ ओउम् कार प्रभु नारायण की उपासना करने में पारंगत तीन महर्षियों शालावान् का पुत्र शिलक, चिकितायन का पुत्र दालभ्य तथा जीवल का पुत्र प्रवाहण परस्पर मिले और भगवान नारायण के उद्-गीथ की कथा पर संवाद करने लगे।
जीवल ने कहा- तुम दोनों महानुभाव परस्पर वार्तालाप करो और मैं सुनूँगा। तब शिलक ने दालभ्य को कहा-
शिलक: मैं तुमसे कुछ पूछूँ ?
दालभ्य: हाँ! हाँ! पूछो।
शिलक: साम की गति और उसका आश्रय क्या है ?
दालभ्य: स्वर! स्वर में साम बसता है।
शिलक: स्वर का आश्रय क्या है ?
दालभ्य: प्राण । क्योंकि प्राण की ही शक्ति से स्वर निकलता है।
शिलक: तो फिर प्राण की गति क्या है?
दालभ्य: अन्न है प्राण का आश्रय, इससे ही तो प्राण बच पाते हैं।
शिलक: अन्न का उद्भव?
दालभ्य: जल! जल से ही अन्न पैदा होता है।
शिलक: जल की गति कौन?
दालभ्य: वह लोक होती है । सूर्य लोक जो कि स्वर्ग है।
शिलक: फिर स्वर्ग??
दालभ्य: अब स्वर्ग को मत लांघो। क्योंकि स्वर्ग भी साम से स्थापित है। भगवान के इस उद्-गीथ से स्वर्ग ही तो प्राप्त होता है। तभी तो साम द्वारा स्वर्ग की स्तुति की जाती है।
तब शिलक ने कहा- तुम्हारा साम तो आश्रय रहित है, यह तो तुच्छ फल प्रदान करेगा। तुम्हारा ज्ञान अभी कच्चा है। उपासना में प्रवीण कोई प्रश्नकर्ता मिल गया तो तुम्हारा सिर नीचा हो जायेगा।
दालभ्य निरूत्तर हो गया । विनम्रता पूर्वक बोला- हे! शिलक! तुम ही बताओ स्वर्ग का आश्रय क्या है?
शिलक ने कहा- सुनो! स्वर्ग लोक का आश्रय यह पृथ्वी लोक है।
और इस पृथ्वी का आश्रय?
यह प्रतिष्ठा लोक है इसके पार सोचना या जाना ठीक नहीं है। इसे हम साम से ही तो स्थापित करते हैं । इसी साम के फल से उत्तम मनुष्य योनि में जन्म प्राप्त होता है ।
तभी अब तक चुप बैठा ऋषि चिकितायन पुत्र प्रवाहण बोल पड़ा-
हे शिलक! तेरे साम का फल तो अंत करने वाला है, नाशवान है । यदि तुम्हे सामोपासना में प्रवीण कोई मिल गया तो उससे वार्तालाप करने में तेरा सिर गिर जायेगा (सिर नीचा हो जायेगा)। (१.८.१-१.८.८)
नवम् खण्ड    

अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानकाशः परायणम् ॥१.९.१
स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्परोवरीयाँसमुद्गीथमुपास्ते ॥१.९.२॥
तँ हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति ॥ १. ९. ३

तथामुष्मिँल्लोके लोक इति स य एतमेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ १. ९. ४
शिलक ने पूछा- तो फिर यह पृथ्वी लोक का आश्रय क्या है?
प्रवाहण ने कहा-आकाश। जो परमात्मा का ही नाम है। यही सबका प्रकाशक भी है और परमेश्वर भी। समस्त प्राणी परमेश्वर से ही उत्पन्न होते हैं और उनकी मृत्यु भी आकाश में ही होती है। जन्म-मरण ईश्वर के ही हाथ है। इसके ऊपर कुछ भी नहीं। भगवान नारायण का धाम ही परम धाम है। यही उद्-गीथ भी है और अनंत भी।  यह देशकाल से भी परे है। इन्हीं नारायण की उपासना से मनुष्य साधारण से महापुरुष हो जाता है। जो भी भगवद्भक्त नारायण के नाम को ही सर्वश्रेष्ठ समझ कर आराधना करता है वह सभी लोकों को जीत कर परम धाम को प्राप्त करता है।
  दशम खण्ड
मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्हचाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥१.१०.१॥


हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तँ होवाच ।नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ॥ १. १०. २ ॥

एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतँस्यादिति होवाच ॥ १. १०. ३

न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो
उदपानमिति ॥ १. १०. ४

स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ    १. १०. ५ ॥

स ह प्रातः संजिहान उवाच यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्राँराजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ १. १०. ६

तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय           ॥ १. १०. ७ ॥

तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ १. १०. ८ ॥

प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति     ॥ १. १०. ९ ॥

एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ १. १०. १० ॥

एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासांचक्रिरे ॥ १. १०. ११ ॥


ऋषि चक का दौहित्र उषस्ति एक बार अपनी निर्धनता की दशा में अपनी भार्या के साथ एक ऐसे कुरुदेश में पहुँचा जो संभवतया टिड्डी दलों या ओलों की वर्षा से पूरी तरह नष्ट हो चुका था । वहाँ उसने हाथियों के स्वामी धनी शासक को देखा। उषस्ति ने उससे भिक्षा माँगी। हाथियों का वह स्वामी बोला-मैंने अपने वस्त्र में कुछ कुछ उड़द रखे है, यही मैं खा रहा हूँ। और तो कुछ है नहीं मेरे पास । यही मुझे भी दे दो उषस्ति ने यह कह कर उससे उड़द ले लिए।
हाथियों का  स्वामी उसे जल देने लगा, लो यह जल भी पी लो”  
उषस्ति बोला- तेरा जल जूठा है यह मैं नहीं ले सकता ।
हाथीवाला बोला- यह उड़द भी तो जूठे है
उषस्ति:- इन उड़द को न खाऊँ तो जी न सकूँगा, पर जल तो अन्य जगह भी उपलब्ध है। मनुस्मृति में भी लिखा है-
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः।
आकाश मिवपङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ मनु १०|१०४॥
            अर्थात यदि प्राणों का संकट हो तो जहाँ कहीं से भी अन्न मिले ग्रहण कर लेना चाहिए। उस अन्न में कीचड़ से लेकर आकाश तक कहीं भी पाप लिप्त नहीं होता है
इस प्रकार यह कहकर बचे हुए उड़द लेकर वह अपनी भार्या के पास आया,पर उसकी पत्नी तब तक किसी अन्य स्थान से अच्छी भिक्षा लेकर खा चुकी थी अतः उसने पति से उड़द लेकर रख लिए। अगले दिन जब उषस्ति जगा और नित्य कर्म से निवृत्त हुआ तब उसने कहा- पास ही एक राजा यज्ञ करने वाला है मेरी योग्यता को देख कर अवश्य ही वह मुझे अपने यज्ञ के लिए ऋत्विज नियुक्त कर देगा, यदि कुछ अन्न मिल जाता तो धन भी प्राप्त हो जाता। पति की क्षुधा तृप्ति के लिए पत्नी ने रात के रखे उड़द निकाल कर उसे दे दिए। वह उन्हें खाकर तृप्ति का अनुभव करने लगा। वह शीघ्र ही राजा के यज्ञ स्थल पर पहुँचा, वहाँ विशाल स्तुति करने वाले अनेक उद्-गाता बैठे थे,उनके समीप बैठ गया और यज्ञ के होता से बोला- हे प्रस्तोता! जो देवता स्तुति में प्राप्त है, जिसकी स्तुति हो रही है यदि उसको न जानकर स्तुति करेगा तो तेरा सिर गिर जाएगा। फिर वह उद्-गाता ब्राह्मणों को कहने लगा- हे उद्-गाता! जो भी देवता इस उद्-गीथ में प्राप्त है, यदि उसको न जानकर स्तोम का गान न करेगा तो तेरा सिर गिर जाएगा। तत्पश्चात प्रतिहर्ता को कहा- हे विध्नहर्ता! जो भी देवता प्रतिहार में प्राप्त है, यदि उसको न जानकर प्रतिहार किया तो तेरा सिर गिर जाएगा। उसके इन वचनों को सुनकर सभी भयभीत होकर अपने-अपने कर्मों को छोड़कर हट गए तथा चुपचाप एक तरफ बैठ गए।
एकादश खण्ड
अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं

विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १. ११. १ ॥

स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः
पर्यैषिषं भगवतो वा अहमवित्त्यान्यानवृषि ॥ १. ११. २ ॥

भगवाँस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति तथेत्यथ
तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवतां यावत्त्वेभ्यो धनं
दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच
॥ १. ११. ३

अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता
प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते
विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति
॥ १. ११. ४

प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि
प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता
प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो
मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ १. ११. ५ ॥

अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता
तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति
मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ १. ११. ६

आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि
भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा
देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो
मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ १. ११. ७ ॥

अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता
प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि
मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा
सा देवतेति ॥ १. ११. ८ ॥

अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतन्यन्नमेव
प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता
तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य
मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ १. ११. ९
वह राजा जो यज्ञ का यजमान था, वहाँ आया और बोला-हे भगवन! आप कौन हैं, कृपया अपना परिचय प्रदान करें।
उषस्ति- मैं उषस्ति चाक्रायण हूँ महानुभाव। 
राजा- मैंने आपका बड़ा नाम सुना है आचार्य! मैंने आपको अपने यज्ञ के होता के लिए और समस्त ऋत्विक कार्यों के लिए बहुत खोजा पर जब आप कहीं न मिले तो मैंने दूसरे ब्राह्मणों को यह सब कार्य दिए। अब कृपया आप ही मेरे सभी यज्ञादि कार्यों के ऋत्विज बनकर मुझे कृतार्थ करें।
उषस्ति- यह सभी ब्राह्मण भी मेरे द्वारा बताई गई स्तुतियों को साथ साथ करें। आप जितनी दक्षिणा इन्हें देवें उतनी ही मुझे भी दें।
राजा- ऐसा ही होगा।


इसके बाद उषस्ति के पास वह प्रस्तोता आया और कहने लगा- आपने कहा था जो देवता स्तुति में प्राप्त है उसे न जानकार यदि स्तुति करेगा तो सिर गिर आएगा, तो बतावें कि वह कौन सा देवता है।
उषस्ति: वह देवता प्राण है, सभी भूतों का जीवन वही है, प्राणिमात्र में उसी प्राण के साथ भगवान प्रवेश करते हैं। भगवान की ही स्तुति करनी है, यह जाने बिना यदि आप स्तुति करते तो सिर नीचा हो जाता।
फिर उद्-गाता ने आकर भी पूछा तो उषस्ति बोला उद्-गीथ में प्राप्त देवता आदित्य हैं। यह भगवान का परम प्रकाशवान धाम है। प्राणिमात्र इसी आदित्य की वजह से प्राणमय बने रहते हैं
प्रतिहार को उत्तर दिया कि प्रतिहार का देवता अन्न है। इसी के चलते प्राणी जीवित रहता है।
इस तरह उषस्ति चक्रायण की कथा वास्तव में भगवान का ब्रह्म का प्राण, आदित्य व अन्न के द्वारा ज्ञान कराने हेतु कही जाती है।   
द्वादश खण्ड
अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज ॥१.१२.१॥

तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायामवा इति ॥ १. १२. २

तान्होवाचेहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयांचकार ॥ १. १२. ३

ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः सँरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिं चक्रुः ॥ १. १२. ४ ॥

ओ३मदा३मों३पिबा३मों३ देवो वरुणः प्रजपतिः सविता२न्नमिहा२हरदन्नपते३ऽन्नमिहा
२हरा२हरो३मिति ॥ १. १२. ५ ॥


इस खण्ड में शौब उद्-गीथ का वर्णन है। वक दालभ्य और ऋषि मित्रा के पुत्र ग्लाब एक बार स्वाध्याय के लिए किसी एकांत स्थान पर निवास कर रहे थे। वहाँ श्वेत श्वा नामक उद्-गाता मनुष्य प्रकट हुआ। दुसरे श्वान आकर उसके पास कहने लगे- हम सभी क्षुधा से व्याकुल हैं, आप भगवान से हमारे लिए अन्न की प्रार्थना करें। उस श्वेत श्वा ने उनको प्रातः आने को कहा। प्रातः वक दालभ्य और ग्लाब भी उनकी प्रतीक्षा करने लगे।  सभी ने एकत्रित होकर बहिष्पवमान    स्तोत्र से स्तुति स्थान में आकर उद्-गान किया। वे स्तुति गाते हुए हिंकार गान करने लगे।
हे परमेश्वर! आप की ही कृपा से हमें अन्न प्राप्त होता है। जल भी प्राप्त होता है। समस्त देव, प्रजापति वरुण, सविता, सूर्य हम सब के हेतु अन्न प्रदान करें। हे अन्न के स्वामी! हमें अन्न प्राप्त कराएँ।  
           
 त्रयोदश खण्ड
अयं वाव लोको हाउकारः वायुर्हाइकारश्चन्द्रमा अथकारः।
आत्मेहकारोऽग्निरीकारः ॥ १. १३. १ ॥

आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वे देवा औहोयिकारः प्रजपतिर्हिंकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराट् ॥ १. १३. २

अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः संचरो हुंकारः ॥ १. १३. ३ ॥

दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति
य एतामेवँसाम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेदेति ॥ १. १३. ४ ॥

सामगान में सामवेद मन्त्रों को गेय रूप में रखने के लिए जिससे उसमें संगीतमय कोमलता सम्मिलित हो, कुछ विशेष अक्षरों को मन्त्र में मिलकर गान किया जाता है। इसमें वर्णन है कि यह पृथ्वी लोक हाउकार है, वायु हाइकार, चन्द्र अथकार आत्मा इहकार अग्नि ईकार है। यही आलाप है। सूर्य का ऊकार स्तोम, आह्वान का एकार, विश्वदेवों का औहोइकार, प्रजापति का हिंकार, प्राण का स्वर, अन्न का अर्थात वाणी का विराट स्तोम है। साहित्य के एकाक्षरीकोष में इनके अर्थ दिए गए हैं।
तेरहवाँ स्तोम अनिर्वचनीय है, जिसे किसी एक के साथ नहीं लगाया जा सकता। वह अन्य से सम्बन्ध रखता है तथा विशेष सामगान में गाया जाता है। वह हुंकार है।
जो वाणी का दूध-सार है उसे वाणी स्वयं ही सामगान उपासक हेतु दोहन करती है, जिससे उपासक अन्नवान का अन्नभोक्ता हो जाता है। जो इस सामोपनिषद को वेद की ही भाँति समझता-जानता है।


प्रथम प्रपाठक समाप्त।

           

  

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