प्राचीन पूजा विधि

वाराणसी के मूर्धन्य और प्रख्यात ज्योतिष विद्वान, कर्मकांडी तथा वेदपाठी ब्राह्मण स्व. श्री वामन जी कन्हैयालाल दीक्षित अपने जीवनपर्यंत समाज तथा संस्कृत साहित्य की सेवा करते रहे |उनके पश्चात उनके सुपुत्र    श्री गणपत जी दीक्षित (गणपत काका) इस प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं | इनके बड़े भ्राता श्री सुदर्शन जी दीक्षित (चमक्कू काका) भी अपनी बैंक सेवानिवृत्ति के पश्चात अपने पिता के ग्रंथों,स्मृतियों और उपलब्ध अत्यंत प्राचीन पुस्तकों के द्वारा उपलब्ध बहुमूल्य कृतियों रूपी धरोहर का संकलन तथा संरक्षण करने में लगे हैं |   इनसे प्राप्त कुछ अद्भुत और दुर्लभ मन्त्रों ,क्रियाओं और प्राचीन पूजा विधि का संकलन किया गया है |  


पूजा विधि
हिंदू सनातन धर्म में किसी भी पूजा-कर्म


का आरम्भ गणपति पूजन से किया जाता है |
गणपति पूजन
ॐ गं महागणपतये नमः |
नमस्कार :-
गणपति परिवारं चारु केयूरहारम् |
गिरिधरवरसारं योगिनीचक्रचारम् ||
भवभयपरिहारं दुःखदारिद्र्यहारम् |
गंपतिमभिवंदे वक्रतुंडावतारम् ||
वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्य समप्रभ |
निर्विध्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा ||
आचमनं :-
ॐ केशवाय नमः | ॐ माधवाय नमः |
ॐ नारायणाय नमः | ॐ गोविन्दाय नमः
हस्तप्रक्षालनाम् |

प्राणायाम :-

 ॐ भू: ॐ भुवः ॐ स्व:ॐ मह:ॐ जनः ॐ


 तपः सत्यं ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि
 धियो योनःप्रचोदयात् | आपो ज्योतिरसोमृतं
 ब्रह्म भूःभुवःस्वरोम् |



पुष्प-जलाभिषेकः-

ॐ अपवित्र पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽ पिवाम् 
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः |
ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरू |

कुंकम तिलकं :-

ॐ स्वस्तिनो मिमीतामश्विना भग स्वस्तिदेव्य दितिर
नर्वणः | स्वस्ति पूणा असुरों दधातुनःस्वस्ति द्यावा 
पृथ्वी सुचेतना स्वस्तये वायुमुपब्रवामहे सोमं
स्वस्ति भुवनस्यपति | बृहस्पति सर्वगणं स्वस्तये
स्वस्तय आदित्यासौ भवंतुनः |

विश्वे देवानो अद्या स्वस्तये वैश्वानरोवसुरग्नि स्वस्तये  
    
देवा अंवंविभवः स्वस्तये स्वस्तिनो रूद्र पात्वं हंसः|

स्वस्तिमित्रा वरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति-


स्वस्ति न इन्द्र्श्चाग्निश्च स्वस्तिनो अदिते कृधि|


स्वस्तिपन्था मनुचरेम् सूर्या चंद्र्मसाविव पुनार्ददताध्नता

जानता संगमे महि|


स्वस्तिन तारक्ष्यमरिष्टनेमीमहभ्युतमवायु संदेवतानां|


असुरध्नमिदं सखंसमत्सु वृहदशोनावमिवारू हेमा|


अहों मुचमां गिर संगय च स्वस्त्यात्रेयं मनसा च

तारक्ष्य प्रयतपाणिः शरणं प्रपद्ये
             
स्वस्ति संवाधष्व भयन्नोस्तु||

हस्त-मिलापक प्रार्थना :-

ॐ श्री गणेशाय नमः| 

ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां नमः| 

श्री गुरुभ्यो नमः| 

श्री इष्ट देवताभ्यो नमः| 

ॐ कुल देवताभ्यो नमः| 

ॐ ग्राम देवताभ्यो नमः| 

ॐ पितृभ्यो नमः| 

ॐ नवग्रहाया नमः| 

ॐ लक्ष्मी नारायणाभ्यो नमः| 

ॐ कुबेरायै नमः| 

ॐ सर्वेभ्योदेवेभ्यो नमः|
ॐ सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः|


लम्बोदरश्च विकटो विध्ननाशो विनायकः|


धूम्र  केतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः|


द्वादशैतानि नामानि यः पठेत्छुणुयादपि|


विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा|


संग्रामे संकटेचैव विध्नतस्य न जायते|



शुक्लांबरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं|



प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्व विध्नोपशान्तये|



अभिप्सितार्थ सिध्यर्थं पूजितो यः सुरा-सुरैः|



सर्व विध्नहरे तस्मै गणाधिपतये नमः|

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ| 



निर्विध्नं कुरु में देव सर्वकार्येषु सर्वदा|

वागी शाद्या सुमनसः सर्वायां  ना मुपक्रमे |


यं नत्वा कृत कृत्याः स्यु स्तं नमामि गजाननं |


गणाधिपं नमस्कृत्यं सूर्य  पुत्रं शनैश्चरं |


राहूं  केतु नमस्कृत्यं कर्मारम्भे विशेषतः |


शक्रादि देवता सर्वं ऋषिश्चैव  तपोधनान् |


गर्गं मुनिं  नमस्कृत्यं नारदं पर्वतस्तथा |


वशिष्ठमं मुनि  शार्दूलं विश्वमित्रं च गोभिलम् | 

व्यासं कण्वं हृषीकेशं देवतं गौतम कृपम्|


अगस्त्यं च पुलत्स्यं च दक्षमित्रं पराशरम्|


भारद्वाजं च मांडल्यं याज्ञवल्क्यं च गालवम्|


अन्ये विप्रास्तपो युक्ता वेदशास्त्र विचक्षणाः|


तांसर्वान् प्रणिप्रव्याह मेतत्करं समारभे|


पीताम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं|


प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविध्नो पशान्तये|


अग्रतः श्रीनरसिंहश्च पृष्ठतः देवकीसुतः|


उभयो पार्श्वयोर्देवो भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ|


लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतश्तेषां पराजयः|


एषा मिन्दीवर्श्यामौ हृदयस्थो जनार्दनः|


तदैवलग्नं सुदिनंतदेव,ताराबलं चन्द्रबलं तदेव|


विद्याबलं दैवबलं तदेव,लक्ष्मीपतेतेंधियुगं स्मरामि्|


यत्र योगेश्वरकृष्णौ,यत्र पार्थोधनुर्धरः


तन्नश्रीर्विजयो भूति ध्रुवानीतिर्मतिर्मम|


सर्वध्वारम्भ कार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वर|


देवादिशंतुनः सिद्धि ब्रह्मेशानजनार्दनः|


सर्वमंगल्य मांगल्ये शिवेसर्वार्थसाधिके,


शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते|


ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो


दंतिः प्रचोदयात|

संकल्प:
ॐ तत्सत्! श्री मद्-भागवतोमहापुराणस्य विष्णोराज्ञा
परावर्तमानस्य ब्राह्मणों ह्रीं द्वितीयेपराद्धे

श्री श्वेतवराहकल्पे  वैवस्वत्-मन्वन्तरे अष्टाविंशतितेम्

युगे कलियुगे कलि प्रथमचरणे बौद्धावतारे


जम्बूद्वीपे भरत खंडे आर्यांतरगते अमुकक्षेत्रे,


अमुकनाम्नि संवत्सरे, अमुकायने, अमुकऋतौ,

अमुकमासे, अमुकपक्षे, अमुक तिथौ, अमुकवासरे,

अमुकनक्षत्रे, अमुकराशिस्त्रे, श्रीसूर्य अमुकराशि स्थिते

देवगुरौ, शेषेसु, ग्रहेषु यथा-यथा राशिस्थान स्थितेषु

सत्सु अमुकगोत्र, अमुकशर्माहं सपत्निकोहं, मम,

सर्वत यशोविजयादि लाभार्थं सर्वारिष्ट निवृत्तिंपूर्वक

सकलमनोरथ कामना सिध्यर्थं,

अप्राप्त लक्ष्मीप्राप्त्यर्थं प्राप्त लक्ष्मी चिरकालसंरक्षणार्थं,

प्रचलित व्यापार, प्रतिष्ठाने बहुधन लाभार्थं,

दुष्टग्रह शान्त्यर्थं, कुबेर प्रसन्नार्थं,


श्रीमहालक्ष्मी प्रसन्नार्थं,

नवग्रह, वरुण कलश, षोडशमातृकादि पूजन पूर्वक

श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, कुबेरैन्द्रादिनां

च गणेशांबिकयोः पूजनं महं करिष्ये ||   
             
      आवाहनं –

ॐ गणनात्वेति द्वि गोत्रो ग्रृत्समयो गणपतिर्जगती

 गणपति आवाहने विनियोगः |

ॐ गणानान्त्वा गणपति गुंहवामहे|

कवि कवीनां मुपाश्रयस्तमं ज्येष्ठ ॐ राजं ब्रह्मेंणां

ब्रह्मणस्पतयं आनेश्रृण्वं नतिभिः सीदसादेनम्  |

गणपति आवाहयामि स्थापयामि|

ॐ जातवेदसः इति मरीचकश्यपो दुर्गास्त्रिष्टुप  दुर्गा


आवाहने विनियोगः |

ॐ जातवेदसे सुनवामसौ मम रातीयुतो निदाहाति वेद |

सने पर्णदति दुर्गाणि विश्वानावेव सिंधुदुरितात्यग्नि

अंबिका आवाहयामि, स्थापयामि |

ॐ तत्सित्वत्यात्रेय प्रतिरथो विश्वेदेवाःस्त्रिष्टुप गणेशांबिकयो

प्रतिष्ठापने विनियोगः |

ॐ तदस्तुमित्रा वरुणातदग्ने शंयोरस्मभ्य मिदमस्तुशस्तं

अशीमही गांधयुतं प्रतिष्ठां नमो दिवेवृहते सादनाय


गणेशाम्बिकाभ्यां नमः | प्रतिष्ठापयामि ||

ॐ भूर्भुवः स्वः सागांभ्यां सायुधाभ्यां सवाहनाभ्यां


सपरिवाराभ्यां सशक्तिकाभ्यां  गणेशाम्बिकाभ्यां


नमः आवाहयामि, स्थापयामि |

आसनम् –

रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्वसौख्यं समन्वितम् |

आसनं च मयाद्तं गृहाण गणनायक ||

ॐ गणेशाम्बिकाभ्यानमः, आसनं समर्पयामि |

(आसन हेतु चावल/अक्षत छोड़े)|

दीपम् –

भो! दीप देवरूपस्वं कर्मसाक्षी हरंविध्न कृत यावात्कर्म


समाप्तिः

स्यात् तावत्वं सुस्थिर भव |

(दीपक में अक्षत डाले)|

कलश पूजन-

ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रूद्र समाश्रितः|

मूले तस्यस्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा स्मृताः||

कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा|

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो अथर्वणः||

अंङ्गैश्च संहिता सर्वे कलशं तु समाश्रितः|

अत्र गायत्री सावित्री शांतिः पुष्टिकरी तथा||

सर्वे समुद्राः सरितास्तीर्थानि जलदा नदाः|

आयान्नु देवपूजार्थ दरितः क्षयकारकाः ||

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वतिः |

नर्मदे सिंधु कावेरी जलऽस्मिन् संनिधि कुरु ||

(पञ्चपल्लव, अक्षत, कुंकुम, ताम्बूल/पान, सुपारी तथा


दक्षिणा रखे |)

षोडश मातृका पूजन-

गौरी पद्मा शची मेधा सावित्री विजय जया

देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोक मातरा ||

धृति पुष्टि स्तथा तुष्टि रात्मन: कुलदेवता

गणेशे नाधिका ह्रोता वृद्धौ पूज्यश्च षोडश:|

ॐ षोडश मातृका पाद्यं अर्घ्यं

आचमनीयं समर्पयामि |

पाद्यं-

उष्णोदकं निर्मलश्च सर्व सौगंध संयुतम्|

पाद प्रक्षाल्य नाथाय द्तंते प्रति गुह्यताम् ||

श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः पाद्यं समर्पयामि |

(पुष्प से जल डाले|)

अर्घ्यं-

ताम्र पात्रे स्थितं तोयं गंध पुष्प फलान्वितम्

सहिरण्यं ददाम्यर्ध्यं गृहाण् गणनायक ||

श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः अर्घ्यं समर्पयामि |

(अर्घ्य अर्पित करें|)

आचमनं-

सर्व तीर्थ समायुक्तं सुगंधिं निर्मलं जलम्

आचम्यतां मया दत्तं प्रसीद परमेश्वर: |

श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः आचमन-जलं

समर्पयामि |

(आचमन जल अर्पित करें| )

जल स्नानं

गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदा जले

स्नानापिऽतोसि मया देव तथा शांति कुरुक्षमें ||









 क्रमशः ......................

टिप्पणियाँ

vijendra tiwari -astroexpert ने कहा…
dhanya vaad -jab bhi kuchh naya kare plz suchit kare.-vktiwari092@gmail.com
Aadwait Sai Anand ने कहा…
Really you did a great job .I salute to you.
Unknown ने कहा…
Pranaam Srimaan jara shodas matrika ka alag alag pura mantra Whatsapp 9439248454 me bhej dijiye na kripa karke
Saksham Sharma ने कहा…
आपको अलग मंत्र मील क्या

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