संदेश

माता लक्ष्मी का निवास स्थान

 महाभारत के अनुशासन पर्व में एक सुंदर वृत्तान्त आता है। महायुद्ध समाप्त हो चुका है। राज्याभिषेक के पश्चात युधिष्ठिर श्रीकृष्ण और अपने भाइयों के साथ शरशैय्या पर पड़े भीष्म के निकट जाकर उनसे धर्म और राजनीति सम्बन्धी उपदेश प्राप्त करते हैं।  इसी क्रम में युधिष्ठिर पूछते हैं- कीदृशे पुरुषे तात स्त्रीषु वा भरतर्षभ। श्रीः पद्मा वसते नित्यं तन्मे ब्रूहि पितामह।। पितामह! मुझे बताइये...किन पुरुषों और स्त्रियों में लक्ष्मी का वास होता है? भीष्म मुस्कुराते हैं और कहते हैं- यही प्रश्न श्रीकृष्ण के साथ बैठी हुई रुक्मिणी देवी ने एक बार कौतूहलवश गरुड़ध्वज नारायण के साथ विराजमान माता लक्ष्मी से पूछा था, तब लक्ष्मीजी ने स्वयं ही कहा था कि- वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे। दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने। अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे। जितेन्द्रियो नित्य मुदीर्ण सत्त्वे। वसामि स्त्रीषु कान्ताषु देवद्विजपरासु। विशुद्धगृहभाण्डासु गोधान्याभिरतासु च।। मैं सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोध से परे, देवाराधन करने वाले, कृतज्ञ, जितेंद्रिय तथा सत्वगुण सम्पन्न पुरुष में तथा कमनीय गुणों वाली, देवताओं तथा ब्...

आशा... a positive hope

 आशा...उम्मीद...hope ****************** यह तब की बात है... जब मनुष्य और देवता... सेवक और भगवान की तरह आपस में एक-दूसरे से मिलते रहते थे।  यह बात अलग है कि यह कहानी पूरी तरह कपोल कल्पित है।  तब कुछ ऐसा होता था कि मनुष्य प्रतिदिन देवता के द्वार पर जाता, सेवा करता, भोग लगाता, चरण दबाता।  बदले में देवता बताते-   "मैंने तुम्हें दिया जल पीने के लिए,  मैंने ही दी यह मधुर सुगंधित वायु,  यह जीवनदायिनी श्वास..। ये स्वादिष्ट और मधुर फल भोजन के लिए मैंने ही दिए हैं, और वनस्पतियाँ और पुष्ट करने वाला अन्न भी तो।" मनुष्य लजाता, शरमाता अपनी दीनता पर...और बारम्बार कृतज्ञता प्रकट करता। ...फिर एक दिन भयभीत होते, डरते मनुष्य ने देवता को अपने घर...अपनी झोपड़ी में आने का आमंत्रण दिया।  " स्वामी! स्वामी! आप तो परम् कृपालु हैं, आपने कितना कुछ दिया है मुझ सेवक को..। मैं कभी कुछ भी तो दे न सका आपको।  कल आप मेरे घर आएँ,  मैं कुछ रूखा सूखा भोजन बनाऊँ, आप मेरे साथ ही खाना खाएँ। सेवा करूँ कुछ आप की...जीम कर जाएँ मेरी कुटिया पर तो कृतार्थ हो सकूँ।  आपके उपकार...

श्री हाटकेश्वरो सदा विजयते

श्री हाटकेश्वरो सदा विजयते। ********************** पृथ्वीलोक के नीचे सप्त पाताल का वर्णन सनातन शास्त्रों में वर्णित है। इन सात में पहला अतल, दूसरा वितल, तीसरा सुतल, चौथा तलातल, पाँचवाँ महातल, छठा रसातल और सातवाँ पाताल । यह सभी पाताल लोक अनन्य ऐश्वर्य, सुख, शोभा तथा वैराग्य से सुशोभित हैं। श्रीब्रह्मा जी ने अलौकिक वितल पाताल में हाटक नामक अद्भुत स्वर्ण के द्वारा भगवान् हाटकेश्वर महादेव के शिवलिङ्ग को रचित-अर्चित किया था। यही नागर ब्राह्मणों के ईष्टदेव हाटकेश्वर महादेव हैं।  कालान्तर में भगवन शिव के आशीर्वाद स्वरुप इनका मंदिर प्राचीन आनर्तदेश तथा वर्तमान वडनगर स्थित है। ऐसे श्री हाटकेश्वर प्रभु का स्मरण करते हुए मैं समस्त विश्व के कल्याण की कामना करता हूँ। ---- आनर्तविषये रम्यं सर्वतीर्थमयं शुभम्। हाटकेश्वरजं क्षेत्रं महापातकानाशम्। मर्यार्हाघंत्दिलिङ्ग हाटकेनविनिर्मितम् । ख्यार्तियास्यति सर्वत्र पाताले हाटकेश्वरम् । ---- यह सत्य ही है कि यह मूल शिवलिंग पाताल में स्थित है। सभी पाताललोक अथाह धन, सुख और अप्रतिम शोभा से परिपूर्ण हैं । कहा जाय कि यह सब लोक स्वर्ग से भी बढकर हैं...

अरे ओ निष्ठुर !

ओह ! दया करो अब तो.. कितना...? कितना तो काम कराते हो यार जब से आया हूँ यहाँ सारा-सारा दिन और रात चौबीसो घण्टे खटवाते हो.. बीस-इक्कीस हजार बार साँस खिंचवाते-छुड़वाते हो कि दिल मेरा बजने लगता बहत्तर बार धाड़-धाड़ शायद... डरता है तुमसे तभी तो चार सौ की स्पीड से भागता है मेरा खून भी नौ हजार छः सौ किलोमीटर तक रोज कोई छुट्टी नहीं न कोई ऑफ़ ओह ! सचमुच तुम कितना काम कराते हो अब तो बख्श दो.. अरे ओ निष्ठुर ! ईश्वर कहीं के..

तितली और पत्ता

तितली को उड़ते देखा स्वच्छंद पत्ते को आया नहीं पसंद अतिशय व्यथा में उसने तितली को बुलाया तितली आई.. उसने पत्ते को भड़काया चूमा उसको कानों में शंख बजाया तुम !...कैसे तो जड़ हो ? पिता..और माता ये जड़ और शाखें तुम सब कितने अक्खड़ हो, उड़ नही सकते, चल नही पाते पड़े-पड़े यहीं जीवन भर क्या किंचित नहीं अघाते ? पत्ते ने कहा तुम ही हो सच्ची मित्र बस और नहीं सहूँगा मुक्ति मिले, उन्मुक्त उड़ूँगा । अपनी माँ..शाखों से उसने उँगलियाँ छुड़ा लीं टहनियाँ रोईं , उसने नजरें झुका लीं। हवा उड़ा ले चली उसे उड़ता था अब तितली जैसे वो फूला नहीं समाता था, प्रसन्न होता मदमस्त वह मंद-मंद मुस्काता था, बस मन ही मन इतराता था जग जीत लिया वह पाता था इच्छा जो जीवन-रस भरती हृद-मन को उल्लासित करती पर ये क्या था, क्यों कर था ये ? क्या जीवन कुल इतना सा था ? यूँ हवा रुकी वह थका-रुका औ गिरा धूल-धूसरित होकर घबराया..पछताया सिर धुन पर अब क्या था..? सब खत्म हुआ, वह मुड़ा अश्रु भर देखा भर, सब कुछ खोया जब खोया घर । पददलित हुआ अब कुछ न रहा, अपनों को छोड़ा, सुख न रहा । ------

मेरी खोज...मेरा डर

मेरी खोज...मेरा डर ************* बच्चा था जब माँ ने कहा प्रणाम करो भगवान को पिता ने सिखाया ईश्वर का स्मरण करो गुरु ने समझाया भगवान बड़ा कारसाज है जीवन वही देता है वही लेता प्राण भी जल थल नभ सब उसकी माया कर्ता वही, धर्ता वही मिल गया था अभीष्ट सर्वस्व था अब इष्ट कुछ और नहीं अब तो मुझे ईश्वर चाहिए था मैं खोजने लगा ईश्वर को खोजने लगा शिवालयों मंदिरों में तीर्थो पहाड़ों में साधुओं नागाओं में और मठों में भी तो.. बहुत भटका फिरता रहा मारा मारा जप किया फिर तप किया सुखा ली देह सारी व्यर्थ हुआ, बीत गया वृद्ध हुआ रीत गया फिर ... कई बार जन्म लिया ढूँढता रहा.. खोजता रहा दूर हर पथ पर.. देखा उसे कई बार मैं भागता.. भागता.. उसकी तरफ पर मेरा ईश्वर तब तक निकल चुका होता... और दूर... मेरी तो सीमा थी .. पर.. उस असीम की, उस सत्य की क्या सीमा जन्मों- जन्म भटकता रहा मैं.. कभी मिलता स्वप्न में भ्रम में कभी किसी तारे के पास जब मैं पहुँचता उस तारे तक... तब तक वह कहीं और ही निकल चुका होता आखिर बहुत थका..बहुत परेशान.. और बहुत प्यासा.. एक दिन .. खोजते ढूँढ़ते मैं ...

मृत्यु सत्य जगत मिथ्या

मृत्यु सत्य जगत मिथ्या (कुछ अलग और विचित्र कहानी है, पर पढ़ें और अपने विचार से अवगत अवश्य करावें.. आपकी समलोचना सर माथे) करके देखें.. मैने तो किया। शवासन में लेटा था मैं...बस इतना ही याद है। ऐसा लगा कि ध्यान की स्थिति में चला गया। ...और फिर देखा कि मैं मर गया। हाँ.. हाँ सचमुच मर गया मैं।  पर...आश्चर्य! मैं यह देख कैसे पा रहा हूँ? हाँ... मैं देख रहा हूँ। मैंने चकित होते हुए देखा अपने आप को, अपने दोनो हाथों, पैरों की तरफ। लेकिन सामने तो पड़ा है मेरा शरीर... वो..उस बिस्तर पर।  अगर मैं जीवित हूँ तो फिर वह क्या है? मैं देख रहा हूँ, मेरा बेटा आसपास के लोगों को..पड़ोसियों को बुला लाया है।  शायद.. यह तो हमारे पड़ोसी डॉ. शर्मा हैं। मेरे समीप ही बैठ गए हैं बिस्तर पर। अपने स्टेथस्कोप से चेक कर रहे हैं, गिनती..धड़कनों की।  कुछ मिला नहीं है शायद, थोड़े से घबरा गए।  जल्दी से गर्दन पर नसों को ढूँढ रहे हैं। नसें तो खैर वहीं पर हैं पर स्पंदन कोई मिला नहीं। सिर हिलाया है उन्होंने और कुछ तो कहा है मेरे बेटे से..पत्नी की तरफ देख कर भी।  मैंने साफ सुना..कह...