संदेश

अरे ओ निष्ठुर !

ओह ! दया करो अब तो.. कितना...? कितना तो काम कराते हो यार जब से आया हूँ यहाँ सारा-सारा दिन और रात चौबीसो घण्टे खटवाते हो.. बीस-इक्कीस हजार बार साँस खिंचवाते-छुड़वाते हो कि दिल मेरा बजने लगता बहत्तर बार धाड़-धाड़ शायद... डरता है तुमसे तभी तो चार सौ की स्पीड से भागता है मेरा खून भी नौ हजार छः सौ किलोमीटर तक रोज कोई छुट्टी नहीं न कोई ऑफ़ ओह ! सचमुच तुम कितना काम कराते हो अब तो बख्श दो.. अरे ओ निष्ठुर ! ईश्वर कहीं के..

तितली और पत्ता

तितली को उड़ते देखा स्वच्छंद पत्ते को आया नहीं पसंद अतिशय व्यथा में उसने तितली को बुलाया तितली आई.. उसने पत्ते को भड़काया चूमा उसको कानों में शंख बजाया तुम !...कैसे तो जड़ हो ? पिता..और माता ये जड़ और शाखें तुम सब कितने अक्खड़ हो, उड़ नही सकते, चल नही पाते पड़े-पड़े यहीं जीवन भर क्या किंचित नहीं अघाते ? पत्ते ने कहा तुम ही हो सच्ची मित्र बस और नहीं सहूँगा मुक्ति मिले, उन्मुक्त उड़ूँगा । अपनी माँ..शाखों से उसने उँगलियाँ छुड़ा लीं टहनियाँ रोईं , उसने नजरें झुका लीं। हवा उड़ा ले चली उसे उड़ता था अब तितली जैसे वो फूला नहीं समाता था, प्रसन्न होता मदमस्त वह मंद-मंद मुस्काता था, बस मन ही मन इतराता था जग जीत लिया वह पाता था इच्छा जो जीवन-रस भरती हृद-मन को उल्लासित करती पर ये क्या था, क्यों कर था ये ? क्या जीवन कुल इतना सा था ? यूँ हवा रुकी वह थका-रुका औ गिरा धूल-धूसरित होकर घबराया..पछताया सिर धुन पर अब क्या था..? सब खत्म हुआ, वह मुड़ा अश्रु भर देखा भर, सब कुछ खोया जब खोया घर । पददलित हुआ अब कुछ न रहा, अपनों को छोड़ा, सुख न रहा । ------

मेरी खोज...मेरा डर

मेरी खोज...मेरा डर ************* बच्चा था जब माँ ने कहा प्रणाम करो भगवान को पिता ने सिखाया ईश्वर का स्मरण करो गुरु ने समझाया भगवान बड़ा कारसाज है जीवन वही देता है वही लेता प्राण भी जल थल नभ सब उसकी माया कर्ता वही, धर्ता वही मिल गया था अभीष्ट सर्वस्व था अब इष्ट कुछ और नहीं अब तो मुझे ईश्वर चाहिए था मैं खोजने लगा ईश्वर को खोजने लगा शिवालयों मंदिरों में तीर्थो पहाड़ों में साधुओं नागाओं में और मठों में भी तो.. बहुत भटका फिरता रहा मारा मारा जप किया फिर तप किया सुखा ली देह सारी व्यर्थ हुआ, बीत गया वृद्ध हुआ रीत गया फिर ... कई बार जन्म लिया ढूँढता रहा.. खोजता रहा दूर हर पथ पर.. देखा उसे कई बार मैं भागता.. भागता.. उसकी तरफ पर मेरा ईश्वर तब तक निकल चुका होता... और दूर... मेरी तो सीमा थी .. पर.. उस असीम की, उस सत्य की क्या सीमा जन्मों- जन्म भटकता रहा मैं.. कभी मिलता स्वप्न में भ्रम में कभी किसी तारे के पास जब मैं पहुँचता उस तारे तक... तब तक वह कहीं और ही निकल चुका होता आखिर बहुत थका..बहुत परेशान.. और बहुत प्यासा.. एक दिन .. खोजते ढूँढ़ते मैं ...

मृत्यु सत्य जगत मिथ्या

मृत्यु सत्य जगत मिथ्या (कुछ अलग और विचित्र कहानी है, पर पढ़ें और अपने विचार से अवगत अवश्य करावें.. आपकी समलोचना सर माथे) करके देखें.. मैने तो किया। शवासन में लेटा था मैं...बस इतना ही याद है। ऐसा लगा कि ध्यान की स्थिति में चला गया। ...और फिर देखा कि मैं मर गया। हाँ.. हाँ सचमुच मर गया मैं।  पर...आश्चर्य! मैं यह देख कैसे पा रहा हूँ? हाँ... मैं देख रहा हूँ। मैंने चकित होते हुए देखा अपने आप को, अपने दोनो हाथों, पैरों की तरफ। लेकिन सामने तो पड़ा है मेरा शरीर... वो..उस बिस्तर पर।  अगर मैं जीवित हूँ तो फिर वह क्या है? मैं देख रहा हूँ, मेरा बेटा आसपास के लोगों को..पड़ोसियों को बुला लाया है।  शायद.. यह तो हमारे पड़ोसी डॉ. शर्मा हैं। मेरे समीप ही बैठ गए हैं बिस्तर पर। अपने स्टेथस्कोप से चेक कर रहे हैं, गिनती..धड़कनों की।  कुछ मिला नहीं है शायद, थोड़े से घबरा गए।  जल्दी से गर्दन पर नसों को ढूँढ रहे हैं। नसें तो खैर वहीं पर हैं पर स्पंदन कोई मिला नहीं। सिर हिलाया है उन्होंने और कुछ तो कहा है मेरे बेटे से..पत्नी की तरफ देख कर भी।  मैंने साफ सुना..कह...

जब बसंत आता

लौट आते हमारे बाबावृक्ष हर साल जब बसन्त आता, जब जाते थे परलोक भी... इहलोक से तब भी वे लेते थे आनंद अपनी यात्रा का... जो बस जरा सी पतझड़ की मृत्यु भर ही तो थी, आत्मा तो उनकी अजर ही थी क्या पता था उनको ये जीवन बसन्त फिर आएगा? नहीं सम्भवतया.. किसी को पता नहीं होता तुम्हें पता है? या कि मुझे? कोई नहीं जानता...जान पाया.. तो ये मौनीबाबा कैसे जानते..? उनसे बिखरा...छिटका, टूटा...या कि तोड़ा गया फूल, पत्ता और फल सब ही तो अंतिम था न...। हमारा प्रेम..मोह खींच लाता उनको बार बार जब बसंत आता उनके नाती पोते से पत्ते फल औ फूल फिर लद जाते उनके कांधों पर..चिपट जाते सीने पर फिर फिर लौट आते बाबावृक्ष जब बसंत आता..।

अभ्युदय (मेरा देश)

अभ्युदय (मेरा देश) *************** "बता साले...नाम क्या है तेरा...बता..." वह पाकिस्तानी सैनिक गला फाड़ कर चीख रहा था। अभ्युदय...विंग कमांडर अभ्युदय निरंकार। उसका चेहरा अब भी निर्विकार था। उसका पूरा मुख रक्त से लथपथ था और नाक से भल्ल भल्ल बहता रूधिर उसकी बड़ी, काली और ऐंठी हुई मूँछों में जाकर न जाने कहाँ विलीन हो रहा था। यह शत्रु देश का मिलिट्री हेड क्वार्टर था। मिलिट्रीबेस कैंप में रखी एक फौलादी कुर्सी पर उसे कस कर बाँधा गया था जो सम्भवतया यातना देने के लिए ही बनाई गई थी। उसके दोनों हाथ रस्सी और गर्दन को पतली वायर रोप से पीछे की तरफ खींच रखा गया था। ...पर वह तना हुआ बैठा था। साढ़े छह फुट की पुष्ट देहयष्टि पर जैसे उसे दी गई यातना का कोई असर न था। भारतीय वायुसेना की पोशाक जैसे उसके गोरे शरीर को गर्व से भर दे रही थी। ...अच्छा! मिशन क्या है तेरा... -नहीं बता सकता। किस स्क्वॉड्रन से है? -बताने की अनुमति नहीं है। स्साले...हरामजादे...यहाँ तू कोई ससुराल नहीं आया है। यहाँ तो बस मेरी ही चलती है। वह बहादुर धीरे से मुस्कुराया भर.. उसकी इस हँसी ने जैसे जलती अग्नि में घी डाल...

क्या मिला क्या खो गया।

क्या मिला क्या खो गया **************** "सुन राजू क माई !! हम बिशनवा के साथ गोबरधन परिकरमा के लिए जा रहे हैं।" "अरे ! हमको भी लिए चलते ना।" नहीं राजू की माई ! अबकी शरद पूरनिमा का प्रोग्राम बना है, हमका जाए दो। अगले महीना हम तोहरा के ले चलेंगे; ठीक है ना ?" "अब आप बनाईए लिए हैं प्रोग्राम, त ठीक है, पर हमरी बड़ी इच्छा थी गोवर्धन परिक्रमा की।" "हम आठ-नौ महीना में रिटायर होइए रहे हैं बस उकरे बाद घूम के आएँगे मथुरा-बिरिन्दाबन भी।" ठीक है, जाइए। रूपवती मुस्काई। दोनों मित्र बाइक से स्टेशन के लिए निकले। कुछ ही दूर गए कि टायर फट गया। बाइक असंतुलित हो पीछे से आते हुए एक ट्रोले की चपेट में आ गई। बिशन को हल्की चोटें थी पर धरमचंद अब भी बेहोश था। ट्रोले का ड्राइवर पकड़ा गया। लोगों ने उसे अस्पताल में पहुँचा दिया। रोती पीटती माँ के साथ उसके दोनों बेटे अस्पताल पहुँचे। बदहवास से...। जाँच में पता चला 'मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर।' बड़ा खर्च आएगा और डिसीजन भी जल्दी लें। डॉक्टर ने कहा। "जी...हम बताते हैं।" सुरेश को बाँह पकड़ कर राजेश एक...