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महाभारत-२७

ये जो समय है न..
चिरयुवा...
बस चलता ही जाता है।
कभी भी..किसी के लिए रुकता नहीं है।
यह अपनी गति भी कभी बदलता नहीं...।
दुःख की घड़ी में इसकी गति कम और सुख में अधिक जान पड़ती है बस..होती नहीं।
हस्तिनापुर में भी समय बस बढ़ा ही जा रहा था...
निरंतर..
कुछ वर्ष और बीत गए थे..।
राजकुमार युधिष्ठिर साक्षात धर्म ही तो थे।
प्रजा से मिलते, विनम्रतापूर्ण व्यवहार करते, उनकी कुशलक्षेम पूछते और यथासंभव सहायता करते, यह उनका दैनिक नियम बन गया था।
उन्होंने अपने कुशल व्यवहार, शील, सदाचार, सत्यपालन और धर्मपरायणता से प्रजा के हृदय में ऐसा स्थान बना लिया था जो कभी राजा पाण्डु और धृतराष्ट्र भी न बना सके थे।
प्रजाजन की भावनाओं को समझते हुए तथा भीष्म और विदुर के कहने पर राजा धृतराष्ट्र ने पांडुनंदन युधिष्ठिर को युवराज पद प्रदान कर दिया।
भीम को गदा अत्यंत प्रिय थी सो उसने बलरामजी से खड़ग व गदा युध्द की शिक्षा लेनी प्रारम्भ कर दी।
अर्जुन धनुषप्रेमी थे। उन्होंने क्षुर, नाराच, भल्ल और विपाठ प्रकार के ऋजु, वक्र और विशाल बाणों का संधान करना और उन सबके गूढ़ तत्वों का संचालन सीख लिया।
निरंतर कड़े अभ्यास के चलते उसने निद्रा क…