महाभारत 6

....से आगे-
देवराज ने वज्र द्वारा उसे ऊपर से दबा लिया। इस प्रकार हे ब्रह्मपुरुष शौनकजी ! मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन आरंभ किया गया। नागराज के मुख की ओर असुर और पुच्छ की ओर देवतागण खड़े हो गए।
उग्रश्रवा जी ने कहा-
फिर समुद्र का भयानक मंथन आरंभ हो गया। इस प्रकार मथे जाने से सहस्त्रों समुद्री प्राणियों और जलचरों का संहार हो गया ।
मंदराचल के ऊपर पत्थरों पर वृक्षों की रगड़ से आग निकलने लगी जिसे इंद्र ने जल वर्षा करके शांत किया ।
बहुत दिनों तक मंथन चलता रहा, इतना कि मंदराचल के ऊपर लगे वृक्षों और औषधि औषधियों से रस निकलकर समुद्र में गिरने लगा समुद्र का जल स्वयं दूध बन गया दूध से घी बनने लगा, पर अभी तक समुद्र से अमृत नहीं निकला था।
देवता और असुर निराश हो चले थे तब भगवान श्रीविष्णु ने सभी को बल प्रदान किया ।
देव-दानवों ने पुनः समुद्र को पूरी गति से मथना आरंभ कर दिया ।
हे शौनक देव! फिर महासागर से सूर्य समान तेजस्वी श्वेतवर्ण प्रसन्नात्मा चंद्रदेव प्रकट हुए जो कालांतर में अपने किशोरारूप में शिवजी के मस्तक पर सुशोभित हुए।
तत्पश्चात श्वेत वस्त्रधारिणी सिंधुकन्या महालक्ष्मी जी का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने श्रीविष्णु को वरण किया।
इसके बाद सुरा-सोमरस निकला। जो लक्ष्मी जी के भगवान विष्णु को वरण करने से क्रुद्ध दानवों को दिया गया।
अब उच्चैश्रवा अश्व प्रकट हुआ, और फिर अनंत किरणों से सुशोभित दिव्य कौस्तुभ मणि निकली जो श्रीनारायण के हृदय पर विराजमान हुई ।
इसके बाद कल्पवृक्ष और कामधेनु सुरभि गौ माता की उत्पत्ति हुई।
अब दिव्य देहधारी श्री धन्वंतरी अपने हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
एरावत हस्त उत्पन्न हुआ जो देवराज का वाहन बना।
. .और फिर निकला कालकूट महाविष जो देव और असुरों की प्रार्थना पर महाशिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया।
अंत में निकला अमृत।
असुरों ने देवी लक्ष्मी और अमृत पाने के लिए देवताओं से वैर बाँध लिया ।
तब भगवान विष्णु ने अपनी लीला रची। मोहिनी रूप धरकर असुरों को मोहित कर दिया तथा हाथ में अमृत कलश लेकर पंगत में बैठे देवताओं को परोसना आरंभ कर दिया ।
असुर पंगत में बैठे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे।
उग्रश्रवा जी कहते हैं-
"हे ब्राह्मण देवता शौनकजी महाराज! जिस समय देवता अमृत पान कर रहे थे उसी समय राहु नामक दानव देवताओं के रूप में उनके साथ बैठ गया और अमृत पान करना आरंभ कर दिया"।
सूर्य व चंद्रदेव ने उसे देख लिया और उसका भेद खोल दिया तब श्री हरि ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा उसका मस्तक विच्छिन्न कर दिया ।
तभी से कंठ में अमृत पहुंच चुके राहु के सिर रूप व धड़ रूप केतू ने चंद्र और सूर्य से स्थाई वैर अपना लिया।
फिर उसी क्षीरसागर के समीप देवासुर संग्राम होने लगा ।
अमृत पान कर चुके देवताओं की विजय हुई मंदराचल को अभिनंदन करके पूर्व स्थान पर पहुंचा दिया गया।कथा को आगे बढ़ाते हुए उग्रश्रवा जी बोले-
यह तो कहानी थी उस समुद्र मंथन की, जिससे वह उच्चश्रवा अश्व प्रकट हुआ था।
जिसे देखकर नाग माता कद्रू ने विनता से पूछा- क्या तुम बता सकती हो बहन! वह दिव्य अश्व किस रंग का है ?
यह श्वेत है भद्रे! विनता ने कहा ।
कद्रू ने व्यंगपूर्ण मुस्कुराहट से उत्तर दिया-
"बहन यह अश्व तो सफेद ही है परंतु इसकी पूंछ काले रंग की है इस बात की तो मैं शर्त भी लगा सकती हूं"।
तब दोनों बहनों में शर्त लग गई कि जिसकी बात गलत होगी वह दूसरे की दासता स्वीकार कर लेगी ।
कद्रू कुटिल थी..
छल-कपट से कार्य करके वह विनता को अपनी दासी बना लेना चाहती थी।
वह जानती थी कि उच्चैश्रवा पूर्णरूपेण श्वेत है।
विनता भी अश्व की श्वेतता को लेकर पूर्ण संतुष्ट थी,
कद्दू ने चाल चली अपने सहस्त्र पुत्रों का तो उसे अभिमान था ही, अपने पुत्रों को आज्ञा दी कि काले रंग के बाल का रूप लेकर अश्व की पूँछ में लिपट जाओ।
पुत्रों ने एक बार में उसकी आज्ञा न मानी तो उसने पुत्रों को ही शाप दे दिया कि यज्ञ की अग्नि तुम्हारा सर्वनाश कर देगी । नाग पुत्र घबरा गए,
संभवतया माता उन्हें क्षमा कर दे और शाप का असर कम हो जाय।
नागपुत्र कर्कोटक ने कहा माता आप धीरज रखें शर्त में विजय आपकी ही होगी मैं अश्व की पूँछ पर लिपट जाऊँगा जिससे आपको अश्व की काली पूँछ ही दिखाई देगी।
हे ऋषिवर ! फिर ऐसा ही हुआ।
कर्कोटक सहित सभी नाग पुत्र जो माता के कहने से उच्चैश्रवा की पूँछ में लिपट गए ।
उधर दोनों बहने उच्चैश्रवा के पास पहुँची ।
उस परम तेजवान अश्व को उन्होंने काली पूँछ वाला देखा। विनता घोर निराशा से मानो जड़ हो गई ।
निर्दयी कद्दू ने तत्काल उसे दासी रूप में लगा लिया ।
समय अपनी गति से चलायमान रहता है, यह कभी किसी के रोके रुकता नहीं।
समय पूरा होते होते महान तेजस्वी विनता के दूसरे पुत्र के रूप में गरुड़ का जन्म हुआ ।
गरुड़ आकाशचारी पक्षी के रूप में उड़ चले।
उनका तेज अग्नि के तुल्य था ।
समस्त देवता भी उनका तेज देखकर देखकर भयभीत हो गए और उनकी स्तुति करने लगे ।
सभी ने उन्हें अपने तेज को कम कर लेने के लिए कहा ।
गरुड़ ने उत्तर दिया हे देवताओं ! आप चिंता ना करें,
मैं अपना तेज समेट लेता हूँ।
उधर राहु को पहचान लेने के कारण सूर्यदेव को राहु का अकेले कोपभाजन बनना पड़ रहा था, अतः सूर्यदेव ने क्रोधित होकर संपूर्ण लोक को भस्म करने का विचार कर लिया।
ब्रह्मा जी ने गरुड़ से कहा-
हे महाभाग! तुम्हारे भ्राता अरुण का जन्म इसी प्रयोजन हुआ है वह आज से सूर्यदेव के सारथी बनकर उनके रथ पर बैठेंगे जिससे वे सूर्य के तेज को भी हर लेंगे ।
उग्रश्रवा ने कहा -
हे महर्षि शौनक जी! गरुड़ ने अपनी माता के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया।
वह अपनी माता के दासत्वको लेकर बहुत दुखी थे ।
उन्होंने माँ से पूछा- हे माता ! कृपया मुझे बताइए कि आपको माता कद्दू की तथा मुझे सर्पों की आज्ञा का पालन क्यों करना पड़ता है?
विनता ने अपनी दुखद गाथा गरुण को सुनाई और कहा- पुत्र ! सर्पों के छल के कारण मुझे अपनी शर्त हारनी पड़ी और बहन की दासी बनकर रहने हेतु मैं विवश हुई।
गरुड़ बहुत दुखी हुए और चिंतित भी ।
सर्पों की तरफ देख कर वे बोले- मैं आप लोगों के लिए ऐसा क्या करूँ कि मुझे अपनी माता के साथ इस दासत्व से सदैव के लिए मुक्ति मिल जाए।
हे भ्राता गरुड़! यदि आप अपने विवेक और पराक्रम से हमारे लिए देवताओं के पास रखा अमृत लेकर आवें जो समुद्र मंथन के पश्चात प्राप्त हुआ है तो आप अपनी माता सहित इस दासता से सदैव के लिए छुटकारा प्राप्त कर सकते हैं ।
अतः शीघ्र ही प्रस्थान करें और हमारे लिए अमृत उपलब्ध कराएँ।
गरुण देव ने अपनी माता का आशीर्वाद लिया और अमृत प्राप्ति हेतु उड़ चले ।
रास्ते में उनके पिता कश्यप ऋषि ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया तथा कहा कि अमृत प्राप्त करने हेतु यदि उनका देवताओं के साथ युद्ध भी होता है तो विजय तुम्हारी ही होगी पुत्र।
ऐसा ही हुआ देवताओं ने उनको अमृत देने से मना कर दिया जिसके कारण देवताओं और उनका भीषण युद्ध हुआ गरुण महान पराक्रमी थे देवताओं को पराजय स्वीकार करनी पड़ी और गरुण जी अमृत प्राप्त कर के सर्पों को देने के लिए चल पड़े ।
आकाश मार्ग में गरुण की अच्युतानंदन भगवान श्री विष्णु से भेंट हुई।
विष्णु भगवान तो अंतर्यामी है और तीनों लोगों के पालनहार तो है ही।
यह सारी लीला उन्होंने देखी समझी और रची थी ।
स्वार्थ रहित तथा माता के लिए किए गए गए उनके पराक्रम से भगवान नारायण अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने गरुण को अपने ध्वज पर विराजमान होने का वरदान दिया ।
गरुण स्वयं भगवान विष्णु का वाहन बन गए ।
स्वयं देवराज इंद्र भी उनके पराक्रम से अभिभूत थे, उन्होंने गरुण से मित्रता की और कहा कि यदि तुमने यह अमृत स्वयं के लिए नहीं प्राप्त की है और दूसरों को देने जा रहे हो तो जरा सोचो क्या वह दुष्ट इस दुर्लभ अमृत के लायक हैं भी क्या?
अमर हो वे अधिक अत्याचारी न बन जाएँगे?
गरुण ने विचार किया कि इंद्र ठीक ही कह रहे हैं ।
सर्पों द्वारा अपने माता के साथ किए गए व्यवहार को याद करके उन्होंने इंद्र से पूछा मित्र आप ही बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए ?
इंद्र ने कहा आप इस अमृत को कुछ क्षणों हेतु कहीं रख देना, मैं इसे हर लूंगा तथा साथ ही आप को वरदान देता हूँ कि आज से सर्प आप के भोजन की सामग्री हो जाएँगे ।
गरुण देव अमृत लेकर लौटे और सर्पों को कहा ।
"मैंने अपने वचन पूरा कर दिया है, अब मैं और मेरी माता तुम्हारी दासता से स्वतंत्र हैं।
मैं यह अमृत कुशा के आसन पर रख देता हूँ।
आप सभी स्नान-ध्यान तथा मंगल वचनों के बाद अमृत-पान करें"
यह कहकर गरुण ने अमृत रख दिया और सभी सर्प स्नान आदि हेतु नदी पर गए, तभी इंद्र ने अमृत का हरण कर लिया और देवलोक को प्रस्थान कर गए।
इधर जब सर्प बंधुओं को स्नानादि के पश्चात अमृत प्राप्त न हुआ तो उन्होंने कुशा को ही चाटना आरम्भ कर दिया।
इससे उनकी जिव्हा दो भागों में विभक्त हो गई।
सर्पों ने गरुण पर धोखा देने का आक्षेप लगाया, गरुण क्रोधित हो उठे और तभी से सर्प गरुण का आहार बन गए।

ऋषिगण बहुत ध्यान से उग्रश्रवा जी से कथा सुन रहे थे।
जब श्रोतागण मन से सुन रहे हों तो वक्ता और भी मुखर और तेजोमय हो जाते हैं।
उग्रश्रवा बोले-
'उन्ही नाग बंधुओं में सर्वश्रेष्ठ और महान तेजस्वी शेषनाग ने अपनी माता के दोषपूर्ण कृत्य से दुखी होकर अपने बांधवों का साथ छोड़ दिया और तप करने का निश्चय करके गंधमादन पर्वत पर चले गए।
वहाँ उन्होंने बदरिकाश्रम में ही अपना तप का स्थान बना लिया और वायु पीकर कठोर तपस्या करने लगे।

क्रमशः

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