महाभारत 5


सूतपुत्र उग्रश्रवा जी की कथा में अब महर्षि शौनक और उनके शिष्यों को आनंद आ रहा था।
उनकी आँखों मे जिज्ञासा के साथ-साथ आश्चर्य का भाव भी स्पष्ट जाग्रत हो रहा था।
सूतकुमार के इतना कहते ही महर्षि शौनक ने उत्सुकता से पूछा - 'हे सूतनंदन ! कृपया मुझे बताइए कि जन्मेजय कौन थे ? उन्होंने सर्पों को मारने का संकल्प क्यों किया था ?
मुझे तथा यहाँ बैठे हुए मेरे सभी ब्राह्मणों को भी यह बताइए कि आस्तिक मुनि कौन थे और उन्होंने सर्पों की रक्षा क्यों और कैसे करें की?' उग्रश्रवा जी ने कहा - हे प्रभुश्रेष्ठ !
यह उपाख्यान बहुत विशाल है और अत्यंत प्राचीन भी।
इसे मेरे पिता लोमहर्षण जी ने मुझे सुनाया था तथा उन्हें श्रवण कराया था स्वयं श्री कृष्णद्वैपायन व्यास जी ने, जो मेरे पिता के गुरुवर थे। सर्वप्रथम इस कथा का वर्णन उन्होंने ही किया था।
हे महानआत्मा शौनक जी महाराज!
'मैं सब पापों का नाश करने वाले इस कथानक का विस्तार से वर्णन करना चाहता हूँ अतः कृपया ध्यान से सभी महानुभाव श्रवण करें।' मुनिवर आस्तिक के पिता एक महान यायावर अर्थात सदा विचरण करने वाले मुनि जरत्कारु थे वह केवल वायु पीकर जीवित रहते थे तथा सभी प्रकार की इंद्रियों तथा निंद्रा आदि जीवन की महती आवश्यकता के ऊपर उन्होंने विजय प्राप्त कर ली थी ।
अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए उन्होंने उपाय पूछा जो सिर नीचे और पैर ऊपर करके विशाल धरती रुपी गड्ढे में लटक रहे थे तब पितरों ने उन्हें मुक्ति प्राप्त कराने के लिए वंश परंपरा बढ़ाने का आदेश दिया तथा जरत्कारु को विवाह करने के लिए कहा।
कालांतर में जरत्कारु ने भिक्षा के रूप में नागराज वासुकि की भगिनी जिसका नाम भी जरत्कारु था, विवाह किया तथा उनके पुत्र थे महान आस्तिक, जिन्होंने जन्मेजय के सर्पसत्र यज्ञ में सर्पों की रक्षा की थी।
उग्रश्रवा जी बोले इसकी एक अन्य भी कथा है कि एक बार नाग माता कद्रू ने सर्पों को नष्ट हो जाने का श्राप दिया था जिसकी शांति के लिए वासुकी ने अपनी बहन का सदाचारी तपस्वी जरत्कारु के संग विवाह किया था। इसी महात्मा जरत्कारु और नागकन्या से मुनि आस्तिक का जन्म हुआ इन्हीं तपस्वी आस्तिक ने पांडववंशी जनमेजय के सर्पसत्र नामक यज्ञ में सर्पों को सर्वसंहार से बचाया।
हे सूत कुमार ! आप इतनी सुंदर कथा कहते हैं कि मन नहीं भरता है।
कृपया महात्मा आस्तिक तथा नाग माता कद्रू के शाप की कथा भी विस्तार से कहिए। हम सभी प्रसन्न और धन्य हो जाएँगे ।
उग्रश्रवा जी ने कहा हे आयुष्मान मुनिवर!
मैंने अक्षरशः जो कथा पिताश्री लोमहर्षण जी से सुनी है उसे विस्तार से कहता हूं।
सतयुग की बात है दक्ष प्रजापति की दो सुंदरी कन्याएँ थी कद्रू और विनता ।
वे दोनों परम सुंदर बहनों का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था ।
एक बार मुनिवर नें दोनों को प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा।
कद्रू ने सहस्त्र नागपुत्रों को पुत्र के रुप में पाने का वरदान माँगा, जिसे सुनकर विनता ने माँगा कि मेरे दो पुत्र हो जो कद्रू के पुत्रों से श्रेष्ठ हो। कद्रू और विनता दोनों ही अपने-अपने वरदान पाकर संतुष्ट हो गई और महर्षि कश्यप
"तुम दोनों अपने अपने गर्भ की धैर्य पूर्वक रक्षा करना"
कहकर तपस्या करने वन में चले गए।
उसके बाद कद्रू ने 1000 और विनता ने दो अंडों को जन्म दिया।
कद्रू के 1000 पुत्र अंडों को फोड़ कर बाहर निकल आए।
विनता के अंडे से बच्चे नहीं निकले तो कद्रू प्रतिदिन उसे लज्जित करती । विनता से जब और धैर्य न रखा गया और उसने एक अंडा फोड़ दिया। उसके ऊपरी भाग पूर्ण विकसित थे पर नीचे के आधे अधूरे अंगों के साथ उसे अपना पुत्र दिखाई दिया।
उस पुत्र को अत्यंत क्रोध आया और उसने माँ से कहा- तुमने मुझे अधीर होकर तथा लोभ में आकर अधूरा बना दिया है अब दूसरा पुत्र ही तेरा उद्धार करेगा तब तक तुझे अपनी बहन और सौत की दासी बन कर रहना पड़ेगा। कालांतर में यही अधूरे शरीर का पुत्र अरुण नाम से विख्यात हुआ और सूर्यदेव के रथ का सारथी बन गया।
उग्रश्रवा ने कहा विनता कद्रू की दासी कैसे बनी इसका दृष्टांत अगर मैं आपको बताता हूं।
समयांतर में विनता को दूसरे पुत्र के रुप में गरुड़ प्राप्त हुए।
एक बार कद्रू और विनता घूमने के लिए निकली।
वहां उन्होंने उच्चैश्रवा नामक एक उत्तम ऐश्वर्यशाली घोड़े को देखा जो देवताओं के द्वारा अमृत के लिए किए जा रहे  समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ था।
शौनक जी ने उग्रश्रवा से पूछा हे सूतनंदन!  पहले मुझे वह कथा सुनाइए कि यह समुद्र मंथन देवताओं ने किस प्रकार और किस स्थान पर किया जिससे परम तेजस्वी अश्वरत्न उत्पन्न हुआ?
उग्रश्रवा जी बोले- हे ब्राह्मण श्रेष्ठ !
मेरु नामसे प्रसिद्ध गिरि प्रदेश है जिस पर एक तरफ भयंकर सर्पों का वास है तो दूसरी तरफ परमदिव्य औषधियाँ भी सुशोभित है। मनुष्यों के लिए तो वहां मन से भी पहुँचना असंभव है। उस पर अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं।
इसी महातेजस्वी गिरि पर्वत के शिखर पर एक बार सभी देवताओं ने बैठकर विचार किया कि अमृत प्राप्त करने के लिए क्या उपाय किया जाए?
तब अच्युतानंदन श्री भगवान नारायण ने बताया कि यदि समस्त देव-दानव मिलकर महासागर का मंथन करें तो अमृत की प्राप्ति संभव है। देवताओं ने असुरों से इस बारे में चर्चा की तो अमृत के नाम से ही असुरों ने हामी भर दी। संपूर्ण देव मिलकर मथानी बनाने के लिए मंदराचल पर्वत को उखाड़ने के लिए पहुँचे जो भूमि के ऊपर और नीचे ग्यारह-ग्यारह सहस्त्र योजन तक फैला हुआ था।
समस्त देवता मिलकर उसे उखाड़ ना सके तब श्री श्री नारायण ने शेषनाग से मंदराचल पर्वत को उखाड़कर समुद्र तट पर ले चलने को कहा। शेषनाग ने मन्दराचल को वन, वनवासी और जटाओं, जीव-जंतुओं सहित उखाड़ लिया तथा देवताओं सहित समुद्र पर्वत पर समुद्र तट पर उपस्थित हो गए।
आज का दिन मानों परम सौभाग्य लेकर आया था। सुर-असुरों का साथ-साथ क्रीड़ा-विलास इसके पूर्व कभी अखिल ब्रह्मांड नायक भगवान नारायण ने भी देखा न था। यह कदाचित एक स्वप्न ही था। सत्य ही तो है,
"आवश्यकता परम शत्रुओं को भी साथ ले आती है।"
देवता अत्यंत प्रसन्न थे और दानव तो अमृत के नाम से ही बस आनंदातिरेक विक्षिप्त हो रहे थे।
देवताओं ने समुद्र से कहा- 'हम सब अमृत प्राप्त करने के लिए आपका मंथन करेंगे।'
समुद्र ने विनती की-  फिर तो उस अमृत में मेरा भी हिस्सा होना चाहिए इससे मंदराचल पर्वत को घुमाने से मुझे जो पीड़ा होगी उसे मैं सह लूँगा, भारी मंदराचल को समुद्र में टिके रहने के लिए भगवान विष्णु ने स्वयं कच्छप अवतार धारण किया और मंदराचल पर्वत के नीचे अपनी पीठ लगा ली ।

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