महाभारत 4

महाभारत 4
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सूतकुमार ने पुनःअपनी कथा प्रारंभ की। बोले-
"हे विप्रवर ! भार्गव ने अपनी पत्नी सुकन्या से एक पुत्र को जन्म दिया था जिसका नाम था प्रमति। वह बहुत बड़े विद्वान और तपस्वी थे उन्होंने घृताची अप्सरा से रुरू नामक पुत्र को जन्म दिया तथा रुरू और प्रमद्धरा से शुनक का जन्म हुआ जिनके आप पुत्र हैं ।
मैं ब्रह्मपुरुष रुरू के चरित्र का वर्णन करता हूँ जो श्रवण योग्य है कृपया सुनिए।"
बहुत पुरातन बात है । गंधर्व राज विश्वावसु और मेनका के गर्भ से एक संतान उत्पन्न हुई।
मेनका अप्सरा अपने आप को किसी बंधन में बाँधना नहीं चाहती थी सो उसने उस बालिका को महर्षि स्थूलकेश के आश्रम में रख दिया। ऋषि ने इस बालिका को देखा और उसे अपने आश्रम में ही पालन-पोषण करने लगे और उसका नाम प्रमद्दरा रखा।
एक दिन रुरू ने प्रमद्दरा को देखा और विवाह करने की इच्छा प्रकट की।
विवाह तय हो गया पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। प्रमद्दरा की सर्प के काटने से मृत्यु हो गई ।
राजा रूरू अत्यंत दुखी हुए और प्रियतमा प्रमद्दरा के वियोग में वन में जाकर विलाप करने लगे।
तभी आकाशवाणी हुई कि आप बहुत धर्मात्मा हैं, यदि आप अपनी आधी आयु दे दें तो प्रमद्दरा जीवित हो सकती है । रुरू ने अपनी आधी आयु देकर प्रमद्दरा को जीवनदान दिया और विवाह किया।
विवाह के पश्चात रुरू ने ठान लिया कि समस्त सर्प उसके शत्रु हैं ।
एक दिन की बात है रुरू ने एक बूढ़े सर्प को देखा और वह दंड का प्रहार कर उसे मारने वाला ही था कि वह सर्प मनुष्य की आवाज में बोलने लगा ।
रुकिए हे श्रेष्ठ ! मैं तो अपने ब्राम्हण मित्र ऋषि खगम को सताने के कारण उससे मिले श्राप से सर्प योनि में हूं मेरा नाम सहस्त्रपाद है और मैं भी ऋषि हूँ।
परंतु द्विज श्रेष्ठ होकर आप का दंड धारण करना और उग्रता शोभा नहीं देती।
यह सब तो क्षत्रियों के कर्म है, जब राजा जनमेजय के यज्ञ में सर्पों का वध होने लगा तब भी आस्तिक ब्राम्हण के कारण सर्पों की रक्षा हुई थी, और आज भी आपके कारण मेरा सर्प योनि से उद्धार हो पाया है यह कहकर सहस्त्रपाद मुनि अंतर्ध्यान हो गए।
क्रमशः--

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