महाभारत 3

महाभारत 3
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उग्रश्रवा जी ने ऋषिवर की तीव्र उत्कंठा भाँप ली और कहा -
'हे महात्मन! भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा था, जो अत्यंत शीलवान और धर्मपरायणा पतिव्रता नारी थी।'
वह अपने पति को अत्यंत प्रिय थी तथा उसके गर्भ में महर्षि भृगु का पुत्र पल रहा था।
एक बार महर्षि भृगु ऋषि स्नान हेतु जैसे ही आश्रम से बाहर निकले, एक पुलोमा नाम का ही राक्षस उनके आश्रम में घुस गया।
इस राक्षस की भी एक कथा है-
बाल्यकाल में भृगु पत्नी पुलोमा रो रही थी तब उसके पिता ने उसे डराने के लिए उसका नाम उसी के घर में छुपे पुलोमा नाम के राक्षस के नाम पर रख दिया और कहा कि वह रोना बंद नहीं करेगी तो उसका विवाह राक्षस के साथ कर देंगे ।
यह वही राक्षस था जो मौका देखकर भृगु के आश्रम में घुस गया था और उसने बाल्यावस्था में ही बालिका पुलोमा को मन ही मन में अपनी पत्नी के रूप में वरण कर लिया था ।
आश्रम में प्रवेश करते ही उस राक्षस की कुदृष्टि भृगु पत्नी पुलोमा पर पड़ी और वह कामदेव के वशीभूत होकर अपनी सुध-बुध खो बैठा।
वह राक्षस भृगुपत्नी को अपनी पत्नी मानता था सो उसे हरण करके ले जाना चाहता था ।
इसके लिए उसके मन में एक कुटिल योजना ने जन्म ले लिया।
"वैसे भी जब कोई गलत कार्य करने लगता है तो उसे सत्य ठहराने के लिए और औचित्य की खोज भी कर ही लेता है।"
राक्षस पुलोमा ने भृगु के आश्रम में ही अग्निहोत्र में अग्निदेव को प्रज्वलित होते हुए देखा और भृगुपत्नी के समक्ष ही अग्निदेव से प्रश्न किया-
"हे अग्नि देवता ! सत्य की शपथ लेकर बताएँ, कि यह पहले से मेरी पत्नी है या नहीं ?
क्या इसके पिता ने भृगु के साथ विवाह के पूर्व ही मुझे विवाह हेतु नहीं सौंप दिया था?
मैंने तो इसे वर्षों पूर्व ही वरण कर लिया था। आप तो परम ज्ञानी और सत्य का साथ देने वाले देवता हैं कृपया सत्य का साथ दीजिए। अग्निदेव बहुत दुखी हुए। क्योंकि सत्य कहना अत्यंत कठिन था और असत्य का साथ वह दे नहीं सकते थे ।
अतः धीरे से उन्होंने कहा - "हे दानवराज ! यह सत्य है कि पुलोमा का वरण तुम्हीं ने पहले किया परंतु इसके पिता ने विधिपूर्वक मंत्रोच्चार करते हुए इसका विवाह भृगु के साथ ही किया है।"
पुलोमा अग्निदेव का वचन सुनकर बहुत दुखी हो गई कि इस दानव ने पहले ही उसका वरण किया था ।
राक्षस ने इतना सुनकर भृगुपत्नी का अपहरण कर लिया ।
उग्रश्रवा जी तनिक रुक कर बोले- 'हे महात्मन! 'हे ऋषिवर! तब भृगु पत्नी के गर्भ में पल रहा वह बालक राक्षस के इस कुकृत्य से क्रोध में भर गया और माता के गर्भ से च्युत होकर बाहर निकल आया और उसने अपने अपूर्व तेज से राक्षस को भस्म कर दिया।
च्युत होकर बाहर निकले बालक का नाम इसीलिए च्यवन हुआ।
माता पुलोमा तब अपने पुत्र च्यवन को लेकर ब्रह्मा जी के पास पहुंची और उसके आँसुओं की बाढ़ से नदी बन गई, जो वसुधरा कहलाई।
जैसे ही महर्षि भृगु को सब बातें पता चली तो अग्निदेव की कही बातों को सुनकर भृगु ने अग्निदेव को सर्वभक्षी होने का श्राप दे दिया। बाद में ब्रह्मा जी ने अग्निदेव को श्राप से मुक्ति दी और कहा कि तुम्हारा सारा शरीर सर्वभक्षी नहीं होगा और केवल तुम्हारी ज्वालाएँ और चिताग्नि ही सर्वक्षण करेगी तथा यज्ञ कार्यों में आहुति के रूप में सभी देवताओं के भाग के रूप में तुम्हें हविष्य अवश्य प्राप्त होगा और तुम्हारे स्पर्श से सभी वस्तुएं शुद्ध हो जाएँगी।
हे महर्षि शौनक देव जी! यही भार्गव च्यवन ऋषि के जन्म का वृतांत है, उग्रश्रवा ने हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए कहा।
शौनक जी अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले- हे सूत कुमार ! मुझे महर्षि भार्गव की कथा भी विस्तार से सुनाइए मैं उत्सुक हो रहा हूं।

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